Shailja Gupta

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(कहानी) कुछ ख्वाहिशें अधूरी सी.....

पूरे कमरे में अंधेरा घुप्प अंधेरा । भरी दोपहरी में भी वह अक्सर ऐसा करती। खिड़कियों के पर्दे बंद कर अंधियारा कर लेती। बच्चों के स्कूल कॉलेज चले जाने के बाद और आभास के ऑफिस जाने के बाद खुद को अंधेरे में धकेल देती। बहुत ख्वाहिशें थी उसकी। पढ़ लिख तो ली थी। उसकी रूचि चित्रकला और नृत्य कला में भी थी। कभी उसने शिक्षिका बनने के ख्वाब देख रखे थे और उसने कोशिश भी की थी पर हर ख्वाहिश कहां पूरी होती है। पिता ने उसका विवाह कर दिया उनका कहना था कि विवाह के बाद वहीं पर करना जो भी करना है अपने ससुराल में।

पर वह विवाह से पहले ही अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती थी। लेकिन  सामाजिक बाध्यताएं और पिता की आर्थिक स्थिति के आगे वह कॉन्पिटेटिव एग्जाम में बैठ ही ना सकी । विवाह पश्चात जब उसने अपने पति को अपनी ख्वाहिश बताई तो उसने साफ कह दिया ......"जो करना है करो तुम्हें खुली छूट है पर मुझे तुम्हारे कुछ भी करने से परेशानी ना हो इस बात का ख्याल रखना।" आभास के कहने का तात्पर्य साफ था उसके खाने-पीने और घर के कार्य में कोई भी बाधा नहीं होनी चाहिए और वह किसी भी प्रकार से घरेलू कार्यों में कमप्रोमाइज करने को तैयार नहीं था। पर इसे भी उसने स्वीकार कर लिया और मेहनत करने लगी ,, देर रात जागकर समय निकाल कर। उसे जाॅब मिली परंतु अब आभास को परेशानी होने लगी। उसने उसे जॉब करने से रोका तो नहीं पर उसके हर कार्य में उसके द्वारा बनाए गए भोजन में ,, उसके द्वारा घुले कपड़ों में हर बात में नुक्स निकालता और चिड़चिड़ाते रहता। अक्सर यही कहता आजकल तुम्हारा ध्यान कहां रहता है।

परिणाम स्वरूप उसे मानसिक तनाव रहने लगा और उसने जॉब छोड़ दी। उसने घर पर ही रहकर चित्रकला और डांसिंग क्लास शुरू किया । पर अब भी आभास का वहीं रुखा व्यवहार गाहे-बगाहे सामने आ जाता। उस पर उसकी सखियाँ जो सिर्फ नाम की थी और  पड़ोसने......" इतना तो अच्छा सब कुछ है तुम्हारे पास फिर यह सब कार्य करने की क्या जरूरत है आराम से रहो घूमो फिरो खाओ पियो मस्त रहो।"

वे सब उसे प्रेरित करना तो दूर की बात उसके कार्यों में बाधाएं जरूर डालने लगी । इन सब से वह और अधिक अवसाद में घिरती जा रही थी। इस से ध्यान हटाने के लिए वह कभी अखबार पढ़ती कभी पत्र-पत्रिका कभी व्हाट्सएप चला लेती तो कभी फेसबुक पर दो चार पंक्तियां लिख देती । पर उसका मन संतुष्ट नहीं हो पा रहा था। फिर एक दिन उसका लिखा लेख अखबार में प्रकाशित हुआ तो वह खुशी से उछल पड़ी और बच्चों को बताया बच्चे तो बहुत खुश हुए और ट्रीट मांगने लगे। आभास का रिएक्शन कुछ खास ना था बोला......" हां हां ठीक है एक आध ही तो छपा है और ऐसा वैसा कुछ ना लिख देना जिससे कंट्रोवर्सी हो और हमें लेने के देने पड़ जाए।" यह कहते हुए वह ऑफिस निकल गया।

आभास ही तो उसके इर्द-गिर्द की दुनिया था । विवाह के बाद से और वही उसके साथ नहीं था । उसके व्यवहार से उसे यही अहसास होता। इस सब से उसका उत्साह जाता रहा। अब हर वक्त उसे अवसाद घेरे रहता । उसने लिखना भी बंद कर दिया। वह दोपहर का वक्त सूने घर में अकेले अंधेरों में पड़ी रहती ।

बेटा बाहर जाब में चला गया। उसका विवाह भी हो गया। अभी बेटी कालेज में प्रथम वर्ष में पढ रही थी। एक दिन वह कालेज से लौटी तो किचन में चाय चढ़ाती मां के गले में बाहें डालते हुए बोली..... "मां  मैम ने कालेज पत्रिका में लेख और कविताएं लिखकर लाने को कहा था परन्तु कोई नहीं लाया तो मैम ने हर स्टूडेंट के लिए अनिवार्य कर दिया है। फिर जिनका सर्वश्रेष्ठ होगा उसे पत्रिका में प्रकाशित किया जाएगा। और पुरस्कृत भी किया जाएगा।"

मालती जी ने दुलार से कहा...."तब मेरी बिटिया समस्या क्या है आप लिखो।"

"पर मां मुझे कहाँ कुछ लिखना आता है। आप तो लिखतीं थीं ना तो आप बताइए ना। "

"लेकिन अब वह सब तो छूट गया अब कहां आता है मुझे।" 

मां की बात सुनकर मौसमी उदास हो गई। और अपने कमरे में चली गई। वह बचपन से मां को देख रही थी। उन्होंने पिता की वजह से सब कुछ छोड़ दिया था। बस घरेलू कामों में ही हर वक्त उलझी रहती।

उसे जल्द ही कुछ लिखना था और अगले दिन ही सम्मिट करना था। पर .....

अगले दिन....."अरे ! यह सब क्या है पूरे कपड़े फैला रखें है।"
" मां वह मेरा टॉप नहीं मिल रहा था तो....."
" तो तूने अपनी अलमारी के साथ ही मेरी भी फैला दी !"
फिर वह बोली.... "माँ ,,  मैं जा रही हूं मुझे बहुत लेट हो रहा है तो प्लीज आप ठीक कर देना। " उसने मां के दोनों कंधों को पीछे से पकड़ कर कमरे के अंदर करते हुए कहा और कालेज के लिए निकल गई।

कल वह जितनी उदास लग रही थी आज वह उससे कहीं अधिक चहक रही थी । मालती जी ने उसे आश्चर्य से देखा और मुस्कुरा दी।

वह अलमारी जमाने लगी उन्हें कुछ याद आया और हड़बड़ा कर अपनी अलमारी की तरफ गई तो देखा नीचे वाला खंड तो वैसा ही जमा हुआ है। उन्होंने राहत की सांस ली।

आज 6 महीने बीत गया था मौसमी के एग्जाम समाप्त हो गए थे और अगला सत्र आरंभ हो चुका था । कॉलेज में एनुअल फंक्शन साहित्यिक सम्मान समारोह भी होने वाला था और कॉलेज की पत्रिका का विमोचन भी होने वाला था। मौसमी जिद करके मालती और अपने पापा को कॉलेज फंक्शन में ले गई थी। वहां कुछ बड़े साहित्यकारों को भी बुलाया गया था। स्वागत नृत्य समारोह के बाद कॉलेज पत्रिका का विमोचन और सर्वश्रेष्ठ रचना को सम्मानित किया जाना था सब में सर्वप्रथम नाम मौसमी का पुकारा गया तो मालती जी का हृदय गदगद हो गया उन्होंने उसे खड़े होकर गले से लगा लिया और वह पुरस्कार लेने स्टेज पर चली गई।

मालती जी मन ही मन सोच रही थी.." मैं नहीं तो क्या मेरी बेटी के जरिए ही मेरी ख्वाहिश पूरी हो रही है।" कुछ देर बाद ही एक अनाउंसमेंट हुआ कॉलेज पत्रिका के बाद एक पुस्तक का भी विमोचन होना है....!

जब उस पुस्तक का प्रसिद्ध साहित्यकार विमल जी द्वारा कवर पेज खोलकर नाम अनाउंस किया गया तो मालती जी दंग रह गई। फिर उन्होंने सोचा कोई और मालती होगी परंतु मौसमी आ गई और उनका हाथ पकड़कर उन्हें स्टेज पर ले गई। विमल जी ने उनके हाथों में जब किताब थमाई उसके कवर पेज पर मालती जी ने स्वयं का चित्र देखा तो उनकी आंखें भीग गई। फिर उन्होंने मौसमी की तरफ भृकुटी तान कर देखा तो.... मौसमी ने अपने कान पकड़ लिया। उसे उनकी अलमारी में उनकी डायरी मिली थी। जिसमें उनके जज़्बात संग्रहित थे। पुस्तक का नाम लिखा हुआ था......

      " कुछ ख्वाहिशें अधूरी सी"


 यह उनका काव्य संग्रह था जो पिछले 1 माह से व्हाट्सएप फेसबुक में चर्चा में था। पर मालती ने पिछले एक माह से फेसबुक और व्हाट्सएप ना चलाया था और ना ही टीवी देखने में उनकी रुचि रह गई।

उन्होंने उस तरफ देखा .....
     "आज आभास भी उनके लिए क्लैप कर रहे थे।"

क्या सच ही आभास क्लैप कर रहा था ? या यह मालती का आभास ही था ?


शैलजा ☘️

#कहानी प्रतियोगिता
#ओपन टापिक

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5 Comments

Shalini Sharma

05-Oct-2021 03:31 PM

Nice

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🤫

19-Sep-2021 05:28 PM

बेहतरीन कहानी....!!

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Miss Lipsa

19-Sep-2021 05:20 PM

Nice

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