Rishabh tomar

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लेखनी गजल -26-Mar-2023

मेरी बर्बादी देख तुम हँसते हो
यार फिर भी दिल में बसते हो

चाँद सा चेहरा झील सी आँखे
कुछ भी हो तुम बड़ा जचते हो

दीप को बुझने से बचना है, प्रेम 
जाँ तुम क्यों बचाने से बचते हो

तुम सा जहरीला तो कोई नही
हजारों बिच्छुओं सा डसते हो

मेरे लिए जिंदगी से बढ़कर थी
थी का मतलब तो समझते हो

जो चाहे, तुम्हें अपना बना ले
यार तुम दिल से बड़े सस्ते हो


ये मजबूरी है, बड़ी उलझन है
बड़ा खूबसूरत स्वाग रचते हो

फंदे के पास रखा दाना पानी
तुम भी इसी कारण सजते हो

तुम पर तरस आयेगा ऋषभ
ये सोच खुद हो ही छलते हो

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9 Comments

बहुत खूब

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क्या उम्दा लेखन है आपका 👏👏👌👌

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Abhinav ji

27-Mar-2023 08:58 AM

Very nice 👌

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