ये मंजिल
ये मंजिल
सूरज की किरणों के साथ निकलता हूं हर रोज
ढलते शाम के साथ लौटता हूं हर रोज।
कभी कभी बादलों में ये सूरज और
मुश्किलों में दब जाता हूं मैं
मगर सीधे मंजिल की ओर चलता हूं हर रोज।
बारिश में सूरज इंतजार करता है रोशनी फैलाने के लिए हर रोज
मैं भी परिश्रम के साथ सब्र रखता हूं हर रोज।
जिस तरह सूरज हार नहीं मानता कई ग्रहों से
मैं भी सामना करता हूं परिस्थितियों का हर रोज।
सीख मिलती है सूरज की किरणों से हर रोज
मंजिल के लिए कैसे जिंदगी
जिया जाता हैं हर रोज।
पंडित अमित कुमार शर्मा
प्रयागराज उत्तर प्रदेश
मो.8707290713