Gopal Gupta

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ग़ज़ल

ग़ज़ल के दिल से जो आह निकली,
सुख़न-वरी   पे  है    वाह  निकली,,

सफ़र मे रस्ता भटक गया हूँ,
न मंजिलों को ये राह निकाली,,

जहाँ पे उलझा हुआ ज़माना,
वही पे उलझी निगाह निकली,,

कभी टटोला जो ख़ुद को तन्हा,
कई  अधूरी  हैं  चाह  निकली,,


बिछड़ के तुम से मरे नहीं पर,
मगर न दिल से ख़्वाह निकली,,

हमें    यक़ीं   था   बची  हुई है,
हयात बिल्कुल तबाह निकली,,

नई कहानी कोई कहो फिर,
गोपाल ये तो सियाह निकली,,



Gopal Gupta" Gopal "

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3 Comments

बेहतरीन

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Milind salve

02-Apr-2023 09:58 PM

ब बहुत सुंदर

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अदिति झा

02-Apr-2023 07:27 PM

V nice

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