ऐन फ्रैंक के डायरी के पन्ने ॅ
मंगलवार, 11 अप्रैल, 1944
मेरी प्यारी किट्टी,
मेरा सिर घूम रहा है। समझ में नहीं आ रहा, कहाँ से शुरू करूँ। गुरुवार (जब मैंने तुम्हें पिछली बार लिखा था ) सब कुछ ठीक-ठाक था। शुक्रवार (गुड फ्राइडे ) हम मोनापोली खेल खेलते रहे। शनिवार भी हम यही खेल खेले। दिन पता ही नहीं चला, कैसे बीत गए। शनिवार कोई दो बजे का वक्त रहा होगा, तेज़ गोलाबारी शुरू हो गई। मशीनगनें चल रही थीं। मर्द लोगों का यही कहना था। बाकी लोगों के लिए सब कुछ शांत था।
रविवार दोपहर के वक्त मेरे आमंत्रण पर पीटर साढ़े चार बजे मुझसे मिलने के लिए
आया सवा पाँच बजे हम ऊपर सामने वाली अटारी पर चले गए। वहाँ हम छः बजे तक
रहे। छः बजे से सवा सात बजे तक रेडियो पर बहुत ही खूबसूरत मोत्जार्ट संगीत बज रहा
था। मुझे रात्रि राग बहुत ही भले लगे। मैं रसोई में तो संगीत सुन ही नहीं पाती, क्योंकि दिव्य
संगीत मेरी आत्मा की गहराइयों में उतरता चला जाता है। रविवार के दिन पीटर स्नान नहीं
कर पाया था। नहाने का टब नीचे ऑफ़िस में गंदे कपड़ों से भरा हुआ रखा था। हम दोनों ऊपर अटारी पर एक साथ गए। हम दोनों आराम से बैठ सकें, इसलिए मुझे जो भी कुशन सामने नज़र आया. मैं ऊपर लेती गई। हम एक पेटी पर बैठ गए। अब हुआ यह कि एक तो वह पेटी बहुत छोटी थी और दूसरे कुशन भी छोटा-सा ही था, हम दोनों एक-दूसरे से बहुत सट कर बैठे हुए थे। सहारा लेने के लिए हमारे पीछे दो और पेटियाँ थीं ही मोरची हमें कंपनी देने के लिए हमारे साथ थी ही।
अचानक पौने नौ बजे मिस्टर वान दान ने सीटी बजाई और पूछा कि कहीं हम मिस्टर डसेल का कुशन तो नहीं ले आए हैं। हम कूदे और कुशन लेकर सीधे नीचे आ गए। बिल्ली और मिस्टर वान दान हमारे साथ थे। यह कुशन ही सारे झगड़े की जड़ था। डसेल इसलिए खफा थे कि मैं वो तकिया उठा लाई थी जिसे वे कुशन की तरह इस्तेमाल करते थे। उन्हें डर था कि उनके तकिए पर पिस्सु चिपक जाएँगे। उन्होंने सारे घर को सिर पर उठा रखा था क्योंकि हम उनका कुशन उठा लाए थे। बदला लेने की नीयत से पीटर और मैंने उनके बिस्तर में दो कड़े बुश घुसेड़ दिए लेकिन जब मिस्टर डसेल ने तय किया कि जाकर अपने कमरे में बैठेंगे तो हमें ये खुश निकाल लेने पड़े। इस छोटे से प्रहसन पर हम हँसते-हँसते लोट-पोट हो गए।
लेकिन हमारा हँसी-मज़ाक जल्दी ही खत्म हो गया। साढ़े नौ बजे पीटर ने हौले से दरवाज़ा खटखटाया और पापा से कहा कि वे जरा ऊपर आएँ, उसे अंग्रेजी के एक कठिन वाक्य में दिक्कत आ रही है।
'मुझे तो दाल में कुछ काला नज़र आ रहा है। मैंने मार्गोट से कहा, 'तय हैं, पीटर ने किसी और बहाने से यह बात कही है।' जिस तरीके से मर्द लोग बात कर रहे हैं, मैं शर्त लगा कर कह सकती हूँ कि सेंधमारी हो रही थी। पिता जी, मिस्टर वान दान और पीटर लपक कर नीचे पहुँच गए। मार्गोट माँ, मिसेज वान दान और मैं ऊपर इंतज़ार करते रहे। चार डरी सहमी औरतें बातें ही तो कर सकती हैं। जब तक हमने नीचे ज़ोर का एक धमाका नहीं सुना, हम बातों में लगी रहीं। उसके बाद का मामला है। मेरा सोचना सही था।
उसी वक्त गोदाम में सब कुछ शांत हो गया। घड़ी ने पौने दस बजाए हमारे चेहरों का रंग उड़ चुका था, इसके बावजूद कि हम डरे हुए थे, हम शांत बने रहे। आदमी लोग कहाँ थे? ये धमाके की आवाज़ कैसी थी? क्या वे लोग सेंधमारों के साथ लड़ रहे थे? हम डर के मारे सोच भी नहीं पा रहे थे। हम सिर्फ इंतज़ार ही कर सकते थे।
दस बजे सीढ़ियों पर कदमों की आवाजें आईं। पापा का चेहरा पीला पड़ चुका था, वे
नर्वस थे। पहले वे भीतर आए। उनके पीछे मिस्टर वान दान, बत्तियाँ बंद कर दो, दबे पाँव ऊपर वाली मंजिल पर चले जाओ, पुलिस के आने की आशंका है। ' अब डरने का वक्त भी नहीं बचा था। बत्तियाँ बुझा दी गई थीं। मैंने फटाफट एक जैकेट उठाई और हम ऊपर जाकर बैठ गए। हमें कुछ भी बतानेवाला कोई भी नहीं था। मर्द लोग वापस नीचे जा चुके थे। वे चारों दस बज कर दस मिनट तक वापिस ही नहीं आए। दो लोग पीटर की खुली खिड़की में से निगाह रखे हुए थे। सीढ़ियों के बीच वाले दरवाजे पर ताला जड़ दिया गया था। बुककेस बंद कर दिया गया था। हमने रात को जलाई जाने वाली बत्ती पर एक स्वेटर डाल दिया। तब उन्होंने हमें सब कुछ बताया कि क्या हुआ था।
पीटर अभी सीढ़ियों पर ही था जब उसने जोर के दो धमाके सुने। वह नीचे गया तो देखता क्या है कि गोदाम के दरवाज़े में से बाईं तरफ़ का आधा फट्टा गायब है। वह लपक कर ऊपर आया और 'होम गार्ड्स' को चौकन्ना किया। वे चारों लपके-लपके नीचे गए। जब वे गोदाम में पहुँचे तो सेंधमार अपने धंधे में लगे हुए थे। बिना सोचे-समझे मिस्टर वान दान चिल्लाए, 'पुलिस...' बाहर भागने की आवाजें आईं। संधमार भाग चुके थे। फट्टे को दोबारा उसकी जगह पर लगाया गया ताकि पुलिस को इस गैप का पता न चले। लेकिन अभी एक पल भी नहीं बीता था कि फट्टा फिर वापस नीचे गिरा दिया गया। पुरुष लोग... सेंधमारों की ढिठाई पर हैरान थे। मिस्टर वान दान और पीटर गुस्से के मारे थरथराने लगे। मिस्टर वान दान ने दरवाज़े पर कुल्हाड़ी का एक जोरदार प्रहार किया। उसके बाद सब कुछ शांत हो गया। एक बार फिर फट्टे को उसकी जगह पर जमाया गया और एक बार फिर उनका यह प्रयास निष्फल कर दिया गया। बाहर की तरफ़ से एक आदमी और एक औरत टॉर्च की रोशनी फेंकते दिखाई दिए। 'क्या मुसीबत है...' उन आदमियों में से एक भुनभुनाया। लेकिन अब संकट यह था कि उनकी भूमिकाएँ बदल चुकी थीं। अब वे पुलिस के बजाए सेंधमारों वाली हालत में आ गए थे। चारों लपक कर ऊपर आए। डसेल और मिस्टर वान दान ने इसेल साहब की किताबें उठाई, पीटर ने दरवाजा खोला, रसोई तथा प्राइवेट ऑफ़िस की खिड़कियाँ खोलीं। फ़ोन को नीचे फर्श पर पटका और आखिरकार चारों बुककेस के पीछे पहुँचने में सफल हो ही गए।
तुम्हारी ऐन