Geeta thakur

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लकीर

विषय शब्द**लकीर**
लेख (एक विचार)


लकीर जीवन में कई प्रकार की होती हैं। लकीरे जो खींची गई सरहदों पर, उनको भी बांट देती हैं।
मन पे पड़ी लकीर रिश्तों को दर्शाती हैं।

घर पर पड़ी लकीर, संबंधों में दरार लाती है।
बटवारा घरों का कर देती हैं।
माथे पे पड़ी लकीर चिन्ता का विषय मानी जाती है।

वहीं जग जाहिर है कि, लक्ष्मण रेखा) की बात।
मां सीता ने भी जब लकीर लांघी थी, तब रावण ने अपहरण किया था।

घर की दहलीज भी लकीर ही कहलाती है।
यानी, मान मर्यादा सब इस लकीर के दायरे में ही आते हैं।

कौन बनाता है ये लकीर?

क्या पुत्र के प्रति अपने कर्तव्यों को निभाती है, मां को सारे हक मिल जाते हैं या पुत्र ये हक दे पाता है?
हर प्रश्न का एक लकीर है। मर्यादा है। जो एक सहज रिश्तों को रोकती हैं, ये लकीर।


जीवन में विभिन्न क्षेत्रों और कार्यों कुछ एक मर्यादाओं का पालन करना चाहिए। अपनी सीमाओं का उल्लंघन नहीं करना चाहिए।
जो नैतिकता, वैधानिकता अथवा स्थापित परंपरा के आधार पर समाज में स्वीकारी गई हैं, हमे उनका पालन करना चाहिए।

इतिहास गवाह है, कि जब भी लकीर खींची गई, बरबाद हुए हैं।

दांपत्य जीवन में जो असफल हो जाते हैं वे तलाक लेते हैं ये भी लकीर ही है। बच्चों के मन में भी माता पिता के प्रति नफ़रत की लकीर खींच जाती है।

नहीं पड़ने दे नफरतों की लकीरें, है लकीर कहती अपनी ही कहानी है।
प्रेम करो, प्रेम बांटो।


गीता ठाकुर दिल्ली से
प्रतियोगिता हेतु लेख

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2 Comments

अच्छा लिखा है आपने 👌👌

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Satvinder Singh

18-Apr-2023 06:12 PM

Nice

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