Natasha

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डार्क हॉर्स


दोनों वापस कमरे पर आ गए। रुस्तम ने रूम दिलवाने को कह ही दिया था। सुबह उठते ही रायसाहब ने सबसे पहले रुस्तम सिंह को फोन मिलाया। फोन ऑफ जा रहा था। दो-तीन घंटे बाद भी यही हाल था। दोपहर तक भी फोन ऑफ ही था।

"ये रुस्तम भाई का फोन ऑफ जा रहा है काफी देर से चलिए हम लोग चलते हैं। प्रोपर्टी डीलर के पास वही दिलवा देगा। जल्दी रूम मिलेगा तो पढ़ाई भी तो शुरू 1 करना है। " रायसाहब ने बता जाने के लिए तैयार होते हुए कहा। असल में रायसाहब भी जल्दी से जल्दी अपना पिंड छुड़ाना चाह रहे थे। कई महीनों के बाद तो रूम पार्टनर घर गया था, इस अकेलेपन का फायदा उठाकर वे भी निजता का आनंद लेना चाहते थे। पार्टनर के घर जाने वाले दिन ही वे एक मित्र का लैपटॉप और कुछ नीली-पीली सीडी ले आए थे पर संतोष ने डेरा डाल सारा मामला खराब कर दिया था। जल्दी रूम नहीं मिलता तो संतोष यहीं टिका रहता। आखिर दिल्ली में वही एकमात्र परिचित थे उसके बेचैनी में हर पल सभी फिल्में रायसाहब मन-ही-मन चला रहे थे वो भी हीरो-हीरोइन का बिना नाम जाने।

ई साला प्रोपर्टी डीलर सबका तो पूछिए मत, कुकर्मियों को पता नहीं किस बात का पैसा चाहिए। खाली रूम का पता बता देता है और किराये का पचास परसेंट डकार जाता है।" रायसाहब ने बत्रा पहुंचते ही खिसियाते हुए कहा।

"चलिए जो होगा दे दिया जाएगा रायसाहब, कतना दिन घूमिएगा हम लोग ! पढ़ना भी तो है!" “अच्छा चलिए अपना एक दोस्त है मनोहर, यहीं अग्रवाल मिष्ठान के पीछे वाली गली में रहता है, उसे ले लेते हैं। जरा ठीक रहेगा रूम खोजने बोजने में " रायसाहब ने

कहा। "हाँ, चलिए" सतोष बोला। दोनों मुखर्जी नगर के मकान नं. 570 की सीढ़ियाँ चढ़ दूसरे फ्लोर पर पहुँचे दरवाजा हल्का सटा हुआ था जैसे दरवाजा खुला, अंदर मनोहर

तौलिया पहने छाती पर कुछ चिपचिपा सा सफेद पदार्थ लगाए जैन साधुओं की तरह बाल नोच रहा था। मुँह पर फेसपैक लगा हुआ था और बालों में काली मेहदी। "अरे का कर रहे हैं मनोहर भाई?" रायसाहब ने घुसते ही कहा। मनोहर पहले तो अकबका गया फिर तुरंत खुद को सहज करते हुए बोला, "अरे कुछ नहीं बस वो चेस्ट का बाल हटा रहे थे। हमको बाल से जाड़ा में भी पसीना आ जाता है। ऊपर बटन भी खोलिए तो थोड़ा ऑड लगता है।"

"एकदम महाराज बाल तो ऐसा नोच रहे हैं जैसे भुट्टा से वाली छोड़ाते हैं।"

रायसाहब ने हँसते हुए कहा। मनोहर ने बिखरे पड़े बाल को पेपर में समेटा और मन-ही- मन रायसाहब को गाली देने लगा, 'साला बिना बताए जब मन तब पहुँच जाता है। खड्स कहीं का। जरलाहा इसीलिए तो उमर से पहले बुढा गया। फैशन का मझ्या- बहिनिया करके रख दिया है ई लोग!" संतोष के लिए यह दृश्य एकदम नया और रोंगटे खड़े करने वाला था। छाती का

बाल नोचना दर्द भी तो करता होगा। वह सोच भी नहीं सकता था जिस छाती के बाल

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