AKHAND MISHRA

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इंसानियत के अनसुलझे पहलू

इंसानियत के अनसुलझे पहलू ____

आदत डालना जरूरी है धोखा खाने की..
कभी रिश्तो में, कभी भावनाओं में, और कभी उन बड़ी-बड़ी बातों में जिनमें अपनापन दिखाकर दूसरों की भावनाओं से खेल लिया जाता है उनका मजाक बना दिया जाता है..पर इंसान ये भूल जाता है कि अगर खुद के साथ अगर ऐसा होता तो शायद बर्दाश्त करना भी मुश्किल हो जाता...

यहां तो भावनाओं में भी गद्दारी है भई.. मानो भावनाएं ना हुईं मोबाइल का कवर हो गई आज लगाओ कल निकाल फेंको..  
इतनी संवेदनहीनता है कि यदि खुद पर जब तक कुछ बीतकर नहीं गुजरता तब तक सामने वाले की तकलीफ और पीड़ा तो उपेक्षा करने लायक और दिखावा ही लगती है।   

अब रिश्ते तो दूरियों में ही परखे जाते हैं.. आंखों के सामने तो हर कोई अपनापन दिखाकर जाता है.. पर क्या है कि जब वक्त साथ नहीं देता ना तो सुकून देने वाला भी दर्द ही देकर जाता है..भावनाओं में भी गद्दारी करके निकल जाते हैं लोग..

ये प्रेम और स्नेह के मायने हैं ही ऐसे कभी बताकर तो होते नहीं... 
और उसके बाद अगर प्रेम सफल नहीं हुआ या ताउम्र भर के लिए नहीं मिला तो समझिए कि पीड़ा और पश्चाताप हर दिन हर, हर एक क्षण सुई की तरह चुभता ही रहेगा और उस पर भी अगर ये मालूम पड़ जाए कि सामने वाले लिए आपके उस स्नेह और लगाव की अहमियत शून्य है.. 

तब इंसान खुद को इतना घृणित और जलील महसूस करता है.. 
सारे किए धरे पर मानो पानी सा फिर जाता है और उस  अंतरात्मा पर वज्रपात सा गिर जाता हैं यह सोच कर कि जिसके लिए अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया जिसके बिना एक पल चैन नहीं आया..

जिसे मन सोते-जागते हमेशा याद करता रहा, जिसकी फिक्र सदैव दिलो-दिमाग में रही जिसकी हर एक तकलीफ को अपनी तकलीफ जैसा महसूस किया, जिसके हर दर्द को अपना दर्द समझा.. 

आज उसी ने एक पल सुध लेने की नहीं सोची.. क्या एक बार भी मन में ख्याल नहीं आया होगा.. उसने एक क्षण भी मेरे दर्द को नहीं समझा और ना महसूस किया.. कैसे दौर से गुजरा हूंगा मै..

जिसने वास्तव में प्रेम और लगाव किया हो भला वह ऐसा कर सकता है.. क्या भावनाओं की भी समाप्ति की तिथि होती है? 

जो चंद महीनों में खत्म हो जाए.. एक वक्त पर इतना अपनापन दिखाया और फिर चंद मिनटों के लिए सुध लेने तक का ख्याल नहीं आया? मैंने तो लाख कोशिशें की पर भूल नहीं पाया किसी क्षण.. हर सुबह खुद को यही समझाकर शुरू करता हूं कि आज उसे बिल्कुल भी याद नहीं करूंगा पर क्या मेरा नियंत्रण हो पाता है मन में..
नहीं हो पाता.. क्योंकि स्नेह और प्रेम में मैंने अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया..

परिणामस्वरूप मेरा मन और अंतरात्मा मेरे नियंत्रण से बाहर हो गई.. मैंने स्नेह और प्रेम के एवज में नुकसान और पीड़ा ही पाई है.. मैंने प्रेम की आसक्ति में डूब कर अपना मानसिक और शारीरिक क्षरण ही किया है.. एकाकी होकर रह गया इस प्रेम में.. किसी एक पर इस कदर केंद्रित हो गया मैं कि आज अकेला रह गया हूं.. सिर्फ अकेला..

एकतरफा चीजें अक्सर तकलीफ देती हैं  फिर वो चाहे स्नेह हो, फ़िक्र हो, यादें हो..स्नेह में न जाने कितनी उपेक्षाएं और दुत्कार सहन कर जाता है इंसान...

शब्दों से गहरी चोट कोई नहीं दे सकता यह सीधे अंतरात्मा पर वार करते हैं और जो आपके कड़वे शब्दों को झेल कर मुस्कुराकर साथ रह जाये उससे ज्यादा स्नेह आपको कोई नहीं कर सकता...
 
हर क्षण बस वही महसूस करते रहना इस गलतफहमी में कि शायद उसे भी परवाह होगी इस भावनात्मक समर्पण की... कीमती आंसू बहाये है, मैंने या यूं कहूं की वास्तविक स्नेह का कर्ज चुकाया है मैंने..हर वक्त

रिश्ते में कदर और अहमियत तभी खत्म होती है जब दिल में स्नेह नहीं रह जाता... मन में अगर एक कतरा भी ख्याल हो तो, परिस्थितियां मायने नहीं रखती... और परिस्थितियों का हवाला देकर सच को बदला नहीं जा सकता.. जहां लगाव होगा वहां परवाह होगी ही.. अगर नहीं है तो समझिए प्रेम में छल लिए गए आप.. और जब कोई अपना बनाकर ऐसे मुंह मोड़ कर चला जाता है तो इंसानियत पर विश्वास खो देना लाजमी है.. 

नियति को भी देखिए ना कैसी परिस्थितियां निर्मित करती है टूटकर स्नेह वहीं हो जाता है जहां उसकी कोई कदर नहीं हो पाती है और ना उसे सही मंजिल नहीं मिल पाती..

कुछ नहीं भूल पाया हूं मैं.... मेरे साथ स्नेह में हुआ वो छल और ना ही वो उपेक्षाएं.. प्रेम के इस मोह के कारण मैंने न जाने कितनी बार सिर्फ दो-चार बातें करने के लिए गिड़गिड़ाया हूं, भीख मांगी है.. वाह रे..स्नेह..! कहां से कहां ला देता है इंसान को..

अपनी पीड़ा को अपने मन के विषाद को किसी से कह नहीं सकता..किसी से बांट नहीं सकता.. लिखना भी नहीं चाहता था पर क्या करूं इसके अलावा मेरी इस पीड़ा की और कोई दवा नहीं.. 

स्नेह और अपनत्व से विश्वास खो चुका हूं मैं.. मेरे साथ हुआ ये छल मुझे याद दिलाता रहेगा की वास्तव में स्नेह करने और दिल से रिश्ते निभाने का यही परिणाम और इनाम यहां इस दुनिया में मिलता है... अब से शाश्वत मौन के साथ खुश रहूंगा यह सोच कर कि तुम्हारी तरफ से सच्चे स्नेह और प्रेम का परिणाम मिला है मुझे... 

____ अखंड मिश्रा "एके"
(स्वरचित एवं मौलिक, सर्वाधिकार सुरक्षित)

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8 Comments

Varsha_Upadhyay

06-May-2023 10:52 PM

शानदार

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AKHAND MISHRA

13-May-2023 10:41 PM

जी बहुत-बहुत आभार

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Punam verma

06-May-2023 09:38 AM

Very nice

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AKHAND MISHRA

13-May-2023 10:42 PM

धन्यवाद।

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Abhinav ji

06-May-2023 08:38 AM

Very nice 👍

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AKHAND MISHRA

13-May-2023 10:42 PM

आभार आपका

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