चोटी की पकड़–58
जमादार जटाशंकर ख़ज़ाने आए। वहाँ से मालखाने गए। रुस्तम की वर्दी पहनी। बाक़ी रहा थोड़ा समय पहरा देने लगे।
पहरा बदला। दूसरे सिपाही आए। बात फैली कि रुस्तम जमादार हो गया। रानीजी ने बनाया है। जमादार और राजाराम बदमाशी में पकड़े गए हैं।
जटाशंकर मुँह दिखाने लायक न रह गए। कुल सिपाही बराबरी का दावा करने लगे और उन्हीं के दिल से कसूरवार करार देने लगे।
राजाराम भी मुरझाया था। फुर्सत के वक्त एकांत में जमादार से बातचीत करता हुआ राज लेने लगा, "जमादार, बड़ा अपमान हुआ। अब तुम सिपाही हो, रुस्तम जमादार। हुक्म राजा का नहीं। माजरा समझ में नहीं आता।"
जमादार ने पूछा, "तुमको क्या जान पड़ता है?"
"या तो तुम फँसे थे, इस औरत ने झूठमूठ हमको भी फँसाया या बुआ की तौहीन की गई और करनेवाला मुसलमान, इसमें राजा की राय हरगिज़ नहीं मालूम देती। बुआ राजा की मान्य की मान्य हैं।"
"इसके बाद इस मुसलमान का हाल क्या होता है, देखना। राजा एक मुसलमान तवायफ लिए ही पड़े रहते हैं। इनके यहाँ बस इतना ही संबँध है।
रानी का हाथ है, ऐसा हमारा विचार है। यह भी संभव है कि खजाने की चोरी रानी ने करायी है। बोलो मत, इसमें बड़ा भारी भेद है। किसी को मालूम नहीं हो सका। रुस्तम का आगे चलकर बुरा हाल होगा। तुमको हम दूसरी जगह बदलने की कोशिश करेंगे।"
बात आग की तरह फैली।
पंद्रह
बाप से यूसुफ को एजाज का राज मिल चुका था। जब एजाज कलकत्ता रहती थी, खोदाबख्श खजानची तनख्वाह के रुपए लेकर कलकत्तेवाली कोठी में ठहरता था
और वहीं से तनख्वाह चुकाकर रसीद लेता था; एजाज को डाकखाने के जरिये रुपए नहीं भेजे जाते थे; अली को यह खबर थी। उन्होंने लड़के को भेद बतलाया था।
इधर, राजा का रानी के पास आना-जाना घटा कि दासियों, दूतियों और तरफदारों से पता लगवाना शुरू हुआ। खोदाबख्श इस पते पर आ गए। ऐसे कई और। रानी के तरफदारों की चालें मामूली खजानची खोदाबख्श, लालच और रानी के प्रेम में न काट सके; जाल में कुंजी डाल दी। प्रेम की कहानी बहुत-कुछ पहली-जैसी, इसलिए घटना और दुर्घटना का बयान रोक लिया गया।