निरुपमा–35
कुमार बँगला में बोला, "हम बंगाली हैं, तुम हिंदुस्तानी हो।"
नीली बँगला में बोली, "आप हिंदुस्तानी हैं। मैं जानती हूँ।"
"मेरी जन्मभूमि कलकत्ता है, फिर मैं हिंदुस्तानी कैसे हूँ?'
"तुम कहाँ रहते हो?"
"ढाका।"
कुमार जोर से हँसा और बँगला का पूर्वबंग वालों पर मजाक बनाया एक पद्य कहा। पद्य बहुत मशहूर है। नीली भी जानती थी।
चूँकि वह पूर्वबंग की थी, इसलिए उसका उत्तर भी उसने रट रखा था जो पूर्वबंग वालों का बनाया हुआ था, सुना दिया। फिर बोली, "दीदी कलकत्ते की है।"।
कुमार ने नीली के मकान में जूते पालिश करने के लिए जाकर भी निरुपमा को देखा था।
समझ गया, पर उस पर कोई बातचीत न की, कहा, "तुम लोग ढाके के बंगाली बनो, इससे तो बेहतर है कि लखनऊ के हिंदुस्तानी रहो। बंगाली हम हैं।"
"हूँ," कुमार के गर्व के स्वर पर अवज्ञापूर्ण ध्वनि करके नीली ने कहा, "आप तो रामपुर में रहते हैं। रामपुर दीदी की जमींदारी है।"
कुमार खूब खुलकर हँसा, कहा, "तुम्हारी दीदी तो बहुत बड़ी जमींदार हैं! तीन घर का गाँव है और कुल नौ खेत, बाकी सब ऊसर!"
"और भी तो गाँव हैं।" नीली कुमार को एकटक देखती हुई बोली।
"तुम्हारी दीदी बहुत बड़ी जमींदार हैं। शादी हो जाएगी तब जमींदारी रखी रहेगी; तब तुम जमींदार होगी।'
"नहीं आप समझे? कहा तो, दीदी कलकत्ते की है; हम ढाका के।"
"हाँ, हाँ, गलती हो गई। तुम्हारी दीदी कलकत्ते से यहाँ कैसे आकर जमींदार बन गईं?"
"आपके गाँव के कौन जमींदार हैं?"
"वे तो रामलोचन बाबू हैं।"
"हैं नहीं, थे। उनका देहांत हो गया, तीन साल हुए। अब दीदी जमींदार है।
काम सब दादा करते हैं।" नीली मन-ही-मन सोच रही थी, दीदी इन्हें प्यार करती है; ये भी दीदी को प्यार करें।
"तो तुम्हारी दीदी की जिससे शादी होगी, वह तो रातोंरात मालदार हो जाएगा।
"हाँ," कहकर नीली खिलखिला दी; कहा, "यामिनी बाबू से होगी।"
यामिनी बाबू का नाम कुमार को याद था। पूछा, "कौन यामिनी बाबू?"
''वह जो यूनिवर्सिटी में अभी लेक्चरर हुए हैं।"
कुमार चप हो गया। फिर जल्दी ही स्वस्थ होकर पूछा, "तुम्हारा नाम?"
"श्री नीलिमा देवी।"