एक खत और--दो शब्द
एक खत और - -दो शब्द
राजीव रावत
वह खत
जो उनके लिए अहसासों का बनता है प्रतिरूप कहीं पर-
वह खत -
जिसके भावों में झलकता है अपनों का रुप कहीं पर-
वह खत के अक्षर
जो जुगूनू की माफिक अपने होने की
कही झलक दे जाते हैं-
और वही है खत के ममनून
जिन्हें पढ़ते-पढ़ते अश्रु छलक भी जाते हैं-
खत में
दिल के जज्बातों को
आहिस्ता आहिस्ता से बह जाने दो-
बिना कहे
जो रहे शब्द खोये से कहीं अंत: में
लिख कर तो कह जाने दो-
शायद
दिल का भारी बादल
बूंदों की बन कर धारा
कुछ दूर तलक तक बह जाये-
दूर पिया के ह्रदय कुंज को भिंगो कर गीला कर जाये-
खत
तू मेरी दिल के दर्द की अनकही दास्ताँ -
आंखे जो उनके आने की जाग जाग कर
ताकती हैं रास्ता -
दिल की धकधक और ह्रदय की पीड़ा-
छलती रातें, छलकती आंखें और तकिया गीला-
खत
तू मेरे दर्द को,
सिसकते अहसासों को
मेरी अनकही आवाज को इस तरह ले जायें-
काश!
उनका खत न आये वो खुद ही आ जायें-
राजीव रावत
#लिखे जो खत तुझे
Niraj Pandey
13-Oct-2021 07:07 PM
बहुत खूब
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Rajeev Rawat
14-Oct-2021 07:57 AM
शुक्रिया
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ऋषभ दिव्येन्द्र
13-Oct-2021 07:03 PM
लाजवाब रचना 👌👌
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Rajeev Rawat
14-Oct-2021 07:57 AM
बहुत बहुत धन्यवाद
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Ravi Goyal
13-Oct-2021 05:31 PM
Bahut khoob 👌👌
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Rajeev Rawat
14-Oct-2021 07:57 AM
धन्यवाद
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