मुसाफ़िर
समा यूँ ही तँन्हा जली है मुसाफ़िर।
अँधेरे की साजिश टली है मुसाफ़िर।।
चला दौर नफ़रत का चारो तरफ है।
ये कैसी हवा अब चली है मुसाफ़िर।।
मिटाया ख़ुदी को तो पाया ख़ुदा को।
नदी आज सागर हुई है मुसाफ़िर।।
देखा यतिमो को सब भर सिसकते।
लगा जैसे रूठी ख़ुशी है मुसाफ़िर ।।
जहाँ भर की दौलत है क़दमो में मेरे।
मगर खल रही इक कमी है मुसाफ़िर।।
शहर में महोबत का मेंला लगा है ।
यूँ आँखों में ठहरी नमी है मुसाफ़िर।।
जहाँ भर की खुशियाँ है दामन में लेकिन।
हुई गुम लबो की हँसी है मुसाफ़िर।।
नहीं मुस्कुराहट किसी के लबो पर।
कायनात सारी दुखी है मुसाफ़िर। ।
संभाला मगर ये संभलता कहा है।
लगी अशुओं की झड़ी है मुसाफ़िर।।
Gopal Gupta" Gopal"
Varsha_Upadhyay
17-Aug-2023 11:31 PM
Nice
Reply
Alka jain
17-Aug-2023 11:14 PM
Nice 👍🏼
Reply
Shahana Parveen
17-Aug-2023 09:00 PM
बहुत सुंदर 👌
Reply