Rajeev kumar

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पूूर्नजन्म

पूूर्नजन्म

पूूर्नजन्म की बात कहीं सच भी होती है भला। यह शब्द तो विरोधाभाष भरा है। कितना यर्थाथ और कितनी कल्पना, यह शब्द तो समझ से परे की बात है। और सारे लोगों की तरह त्रिभुवन बाबू का भी यही विचार था। उनको पूर्नजन्म शब्द सुनना पसंद था लेेकिन कहीं भी पूर्नजन्म का चर्चा  या इस बात पर बहस होती थी तो त्रिभुवन बाबू वहाँ से खिसक लेने में अपने और अपने समय की भलाई  समझते थे।
आज भी त्रिभुवन बाबू ने ऐसा ही किया। साईकिल खड़ी कर , दरवाजा पर दस्तक देने के लिए ज्यों ही उन्होंने अपना हाथ बढ़ाया कि चांय की आवाज के साथ दरवाजा खुल गया। त्रिभुवन बाबू  के चेहरे पर ताजगी भरा जोरदार झौंका टकराया सा प्रतीत हुआ क्योंकि उनकी पत्नी रामवती चैखट पर ही खड़ी थी और मनमोहिनी सी प्रतीत हो रही थी। ताजगी भरा झौंका रामवती की मुस्कान के कारण अचानक उत्पन्न होे  गयाा था।ं
’’ आज थोेड़ी सी देेर हो गई, कहाँ रह गए थे ? ’’ साईकिल की हैंडिल से टिफीन बाॅक्स का झोेला उतारते हुए रामवती ने  पुछा।
रूपयों की गड्डी और मिठाई कका डिब्बा पकड़ाते हुए त्रिभुवन बाबू ने जवाब दिया ’’ अरेे कुछ नहीं, वो तो दश्रथ बाबू मिल गए थे, वो पैदल ही थे, उनके संग-संग मैं भी पैदल ही चलने लगा। पूर्नजन्म वाली बेतूकी सी बात उन्होंने छेड़ दी थी। मेरा तो हंस-हंस कर पेट फूलने लगा था। ’’
पत्नी की मुश्की और चाय की चुस्की का सेवन करके त्रिभुवन बाबू को ताजगी का पूूरा-पूरा एहसास हुआ।
कारखाना से लौटने के बाद त्रिभूवन बाबू अपने घर पर ही सारा समय देते थे। बच्चा तो था नहीं, पत्नी को ही समय देते थे।
रात्रि के भोजन के बाद विस्तर पर पड़ते ही आधा घंटा  इधर-उधर की बात करने के बाद त्रिभूवन बाबू ने अपनी पत्नी से कहा ’’ और एक मजेेदार बात सुनोगी ? ’’
कोई हाँ हूँ में जवाब नहीं आया, आता भी कहाँ से, रामवती तो निद्रा लोक में विचनण कर रही थी। थोड़ी देर करवटें बदलने के बाद त्रिभुवन बाबू को नींद आ गई और स्वप्नलोक में त्रिभुवन बाबू ने प्रवेश किया।
स्वप्न में त्रिभुवन बाबू ने देखा कि सड़क दुर्घटना में उनका मृत शरीर सड़क के किनारे पड़ा हुआ है। भीड़ देखकर प्रशासन आई और लावारिस लाश समझकर जलाया जा रहा है।
त्रिभुवन बाबू जिस कारखाना में काम करते थे उसके मालिक सुखवीर चैधरी के घर में एक  बच्चा जन्म लिया। बच्चा जब थोड़ा सा बड़ा हुआ तो सुखवीर चैधरी ने महसूस किया कि  उनका बच्चा उनको एकटक निहार जा रहा है और उस बच्चे नेे पापा की जगह मालिक कह के सम्बोधित किया तो सुखवीर चैधरी जी को बहूत ही अचरज हुआ।ं सुखवीर चैेधरी जी ने पत्नी रमा की तरफ देख कर अपने पुत्र से कहा ’’ मालिक नहीं, पापा बोलो बेटा रोेहन। ’’
’’ नहीं, मेरा नाम रोहन नहीं है। ’’ बच्चे ने तोतली जुबान में कहा।ं
’’ आपने हमको पहचाना नहीं मालिक, मैं त्रिभुवन दास, आपकी कम्पनी में बुलडोजर चलाता था। ’’
सुखवीर  चैधरी जी को याद आया कि बुलडोजर तो त्रिभुवन दास ही चलाता है।।
’’ पर बेटा, तुमको कैसे मालूम यह सब ? ’’ सुखवीर चैधरी ने रोहन को गोद में उठाते हुए पुछा।
’’ मालिक, मैं ही त्रिभुवन दास हूँ। ’’ बच्चे ने तोतली आवाज में फिर कहा।
सुखवीर चैधरी ने उत्सुक्तावश और जाँच  करने के इरादे से पुछा ’’ तूम अपने साथ काम करने वालों के नाम बता सकते हो ? ’’
’’ राम भगत, शिवचरण, अब्दूल रहीम। ’’ बच्चेे ने बताना शुरू किया तो सुन कर सुखवीर चैधरी दंग रह गए कि ये सब तो मेरे कारखाने में काम करने वाले महत्वपूर्ण लोग हैं। ’’
बच्चे ने कहा ’’ अब हमको घर जाना है, मेरी पत्नी मेरी राह देेख रही होगी। ’’
’’ कहाँ है तुम्हारा घर और तुम्हारी पत्नी का क्या नाम है ? ’’
’’ आनंद नगर में  और पत्नी का नाम रामवती है। ’’ अपनी बात खत्म कर बच्चा दौड़ने लगा और गिर गया।
धड़ाम से गिरने की आवाज के साथ ही त्रिभूवन दास की नींद खुली। उन्होंनेे अपनी पत्नी को झकझोर कर उठाया और कहा ’’जानती हो भाग्यवान, सपना में मेरा पूर्नजन्म हुआ था। ’’
रामवती आँचल में मुँह छुपा कर धीरे-धीरे हंसने लगी।
त्रिभूवन  दास ने पूर्नजन्म के स्वप्न वाली बात अपने मालिक और सहपाठीयों को  सुनायी तो उन लोगों का हंसते-हंसते पेट फूल गया।
त्रिभुवन दास खुद शरमा गए औैर बहुत दिनांें तक हास्य के पात्र बने रहे।

समाप्त

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6 Comments

Rupesh Kumar

18-Dec-2023 07:34 PM

Nice

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Khushbu

18-Dec-2023 05:13 PM

Nyc

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Shnaya

17-Dec-2023 02:27 PM

Nice

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