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स्वामी विवेकानंद जयंती

✍🏻 प्रतियोगिता हेतु लेख
विषय**   स्वामी विवेकानंद जयंती 

 । आज ऐसे महान संत का जनम है।
   श्रध्दा सुमन अर्पित करते हैं।
नाम मेरा नरेन्द्र नाथ दत्त।
निवास स्थान मेरा**कलकत्ता
माता का नाम**श्री मती भुवनेश्वरी
पिता का नाम**विश्व नाथ दत्त

आप ठीक समझे 12जनवरी 1863को मेरे जन्म की तारीख थी। लोग मुझे स्वामी (विवेकानंद) के रूप में जानते हैं।
पिताजी हाई कोर्ट के वकील थे।
मां मेरी धार्मिक विचारों वाली।

मैं आज स्वामी विवेकानंद जयंती के उपलक्ष में स्वामी जी के विचार प्रस्तुत कर रही हूं। क्योंकि आज उनकी जन्म तारीख है।

बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि वाले। अतिथि का स्वागत करते, चाहे उनके पास अपने लिए कुछ ना हो। स्वामी जी का जीवन गुरूदेव श्री राम कृष्ण को समर्पित था।

विवेकानंद शुरु से ही स्वप्न दृष्टा थे। आपने नए समाज की कल्पना की। ऐसा समाज जिसमें धर्म या जाति के आधार पर कोई आपस में मतभेद नहीं करे।
आपने वेदांत के सिद्धांतों को इसी रूप में रखा। अध्यात्म वाद बनाम भौतिक वाद के विवाद में पड़े बिना भी यह कहा जा सकता है।
विवेकानंद जी को युवकों से बड़ी आशाएं थीं।
स्वयं के अस्तित्व को अपने गुरुदेव के स्वरूप में विलीन कर सके ऐसा वह चाहते गुरु के प्रति बहुत आदर और सम्मान रहा।
पूरे विश्व में आध्यात्मिक भंडार की महक फैला सकें, एक महान व्यक्तित्व की नीव में थी। ऐसी गुरु भक्ति गुरु सेवा और गुरु के प्रति अनन्य निष्ठा थी।

25 वर्ष की अवस्था में नरेंद्र यानी कि स्वामी विवेकानंद ने गेरुआ वस्त्र धारण करें। पैदल ही पूरे भारतवर्ष की यात्रा की।
एक बार स्वामी विवेकानंद भारत के प्रतिनिधि के रूप में यूरोप गए। उनको कम समझने वाले लोगों को आश्चर्यचकित में डाल दिया। उनके विचार सुनकर सभी लोग आश्चर्यचकित हो गए और बहुत उनको मान सम्मान मिला।

स्वामी जी केवल संत ही नहीं एक महान देशभक्त वक्ता विचारक लेखक और मानव प्रेमी भी थे।
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की भी एक प्रमुख प्रेरणा स्त्रोत बने। उनका विश्वास था कि पवित्र भारतवर्ष धर्म एवं दर्शन की पुण्य भूमि है। यहां बड़े-बड़े भारत मा और इशू का जन्म हुआ। इसीलिए भारत को संन्यास और क्या की भूमि कहते हैं। आदि काल से लेकर आज तक मनुष्य के लिए जीवन के सर्वोच्च आदर्श एवं मुक्ति का द्वार खुला हुआ है।

स्वामी जी के मुख्य विचार
उठो जागो स्वयं जागकर औरों को जगाओ। अपने नर जन्म को सफल करो और तब तक रुको नहीं जब तक कि लक्ष्य प्राप्त ना हो जाए।
स्वामी जी की शिक्षा द्वारा लौकिक एवं पारलौकिक दोनों जीवन के लिए तैयार करना चाहते थे।
लौकी की दृष्टि से शिक्षा के संबंध में उन्होंने कहा कि हमें ऐसे सीखना चाहिए जिससे चरित्र का गठन हो मन का बल बड़े, बुद्धि का विकास हो और व्यक्ति स्वावलंबी बने।
पारलौकिक दृष्टि से उन्होंने कहा कि शिक्षा मनुष्य की अंतर्निहित पूर्णता की अभिव्यक्ति है।

बालक और बालिकाओं दोनों का समान शिक्षा मिलनी चाहिए।
धार्मिक शिक्षा पुस्तको द्वारा ना देकर आचरण एवं संस्कारों द्वारा देनी चाहिए।
पाठ्यक्रम में लौकिक और पारलौकिक दोनों प्रकार के विषयों का स्थान देना चाहिए।
देश की आर्थिक प्रगति के लिए तकनीकी शिक्षा की व्यवस्था की जाए।
स्वामी विवेकानंद जी के मशहूर संदेश में एक बार कहा कि जब तक तुम खुद पर भरोसा नहीं कर सकते तब तक भगवान पर भी भरोसा नहीं कर सकते। खुद को या दूसरों को कमजोर समझना दुनिया का एकमात्र पाप है।
जितना बड़ा संघर्ष होगा जीत भी उतनी ही शानदार होगी।
जैसा तुम सोचते हो वैसे ही बन जाओगे।

ऐसी विचारों वाले स्वामी विवेकानंद जी को शत-शत नमन देश की युवा सब करते हैं।
आपकी जन्म तारीख पर आपको कोटि-कोटि नमन समूचा विद्वान करते हैं।

गीता ठाकुर दिल्ली
स्वैच्छिक रचना लेख
12/1/24
प्रतियोगिता हेतु

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6 Comments

Reyaan

18-Jan-2024 10:43 AM

V nice

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Shnaya

17-Jan-2024 11:17 PM

Nice one

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Varsha_Upadhyay

14-Jan-2024 12:37 PM

Nice

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