लोहड़ी पर्व
लोहड़ी पर्व
क्या है लोहड़ी पर्व का मतलब
इसका अर्थ***ल (लकड़ी)+ओह (गोबर के सूखे उपले)+डी (रेवड़ी)।
लोहड़ी का त्यौहार भगवान श्री कृष्ण से भी जुड़ा है इसका सम्बन्ध।
कथा के अनुसार कंस ने भगवान श्री कृष्ण को मारने के लिए नंद गांव में लोहिता नाम की राक्षसी को भेजा था, उस समय सभी लोग मकर संक्रांति पर्व की तैयारी कर रहे थे, अवसर का लाभ उठाकर लोहिता ने श्री कृष्ण को मारना चाहा मगर कृष्ण जी ने लोहिता का वध कर दिया। इस वजए से भी मकर संक्रांति से एक दिन पहले लोहड़ी पर्व मनाया जाता है।
भारत देश कृषि प्रधान देश है, यहां त्यौहार भी उसी हिसाब से मनाते हैं।
लोहड़ी पर्व पारंपरिक तौर पर फसल की कटाई और नई फसल की बुआई से जुड़ा है।
लोहड़ी की अग्नि में रवि की फसल के तौर पर तिल, मूंगफली, रेवड़ी, गुड़ और मक्का के भुने दाने अग्नि को अर्पित करते हैं।
इस तरह सूर्य देव, अग्नि देव के प्रति आभर वयक्त करते हैं।
घर में नए मेहमान के आने की खुशी में, या दुलहन घर आती है तो इस खुशी में भी लोहड़ी पर्व मनाया जाता है। उनके स्वागत के लिए ऐसा करते हैं। मिलजुल खुशी मनाते हैं।
वैसे पंजाब का प्रमुख त्योहार है लोकगीत गाकर अपनी खुशी का इज़हार करते हैं। जनवरी १३(पौष मास) का अन्तिम दिन होता है।
माना जाता है कि इस दिन धरती सूर्य से अपने सुदूर बिंदु से फिर दुबारा सूर्य की ओर मुख करना आरंभ कर देता है।
खुशी मानने के लिय सब लोग रात को एक खुले स्थान पर एकत्र होते हैं। लकड़ियां इकठ्ठी करते हैं और उपले डालकर घी कपूर से अग्नि प्रज्वलित करते हैं।
अग्नि के चारों ओर परिक्रमा करते हुए रेवड़ी फुले, मूंगफली डालकर अच्छी फसल का धन्यवाद करते हैं और आगे अच्छी फसल की प्रार्थना करते हैं।
अब तो शहरों में कम ही करते हैं, खुली जगह नहीं बची। जो आनंद गांव में आता था वो अब कहीं नहीं दिखता। फिलहाल जो भी हो, हर त्यौहार नई ऋतु का आगमन, उसका स्वागत करने के लिए ही मनाते हैं और साथ ही प्रकृति से प्यार करने का संदेशा लाते हैं।
लोहड़ी पर्व पर दुल्हा भट्टी वाले का गीत
इसके पीछे क्या है पर्व की वजह।
लोहड़ी का त्यौहार जिसका प्रारंभ यूं तो भगवान श्री कृष्ण की कथाओं से हैं। प्राचीन कथाओं में लोहड़ी को लोहिता राक्षसी के अंत से जोड़कर मनाने की बात कही जाती है। लोहिता पूतना की तरह राक्षसी थी जो भगवान श्री कृष्ण का अंत कर देना चाहती थी। लेकिन पूतना की तरह काल के गाल में समा गई। लेकिन पंजाब में लोहड़ी का रंग कुछ अलग ही है। यहां लोहड़ी में दुल्हा भट्टी जिनका मूल नाम राय अब्दुल्ला खान था। राय अब्दुल्ला खान मुगलों के जमाने में थे। मुगल बादशाह हुमायूं ने दुल्हा भट्टी के पिता और दादा को मरवा दिया था। दुल्हा भट्टी का जन्म 1547 पाकिस्तान की पंजाब पिंडी में माना जाता है।
यह मुगलों के सिपाही जमीदार और अमीरों से धन छीन कर गरीबों में बांट दिया करते थे। गरीब इन्हें मसीहा की तरह मानते थे। लेकिन लोहड़ी का त्यौहार दुल्ला भट्टी कैसे जुड़ गए यह भी एक रोचक कथा है। ऐसी मान्यता है की सुंदर दास नाम का एक किसान था, उसकी दो सुंदर बेटियां थी जिसका नाम सुंदरी और मुंद्री था। इन लड़कियों पर वहां के नंबरदार की नीयत ठीक नहीं थी, वह उन दोनों लड़कियों से शादी करना चाहता था लेकिन सुंदर दास अपनी बेटियों की शादी अपनी पसंद के हिसाब से करना चाहता था नंबरदार से डरकर सुंदरदास में अपनी परेशानी दुल्ला भट्टी वाले को बताया, इसके बाद दुल्ला भट्टी ने लोहड़ी के दिन नंबरदार के खेतों में आग लगा दी और सुंदरी मुंदरी के भाई बन कर उनका विवाह करवाया।
इस घटना की याद में हर साल लोहड़ी की अग्नि जलाई जाती है। दुल्ला भट्टी और सुंदर मुंद्रीय की कथा सुनी जाती है। लोकगीत भी इस दिन लोग गाते हैं। जिससे दूल्हा भट्टी को याद करते हैं। कहते हैं बादशाह अकबर को भी दुल्ला भट्टी ने पकड़ लिया था। जुल्म के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाले दूल्हा भट्टी को अकबर ने धोखे से पकड़ वाया था और आनन-फानन में इन्हें फांसी दे दी गई। लेकिन आज भी दुल्ला भट्टी लोगों के दिलों में जिंदा है और उनकी कहानी आज भी लोगों को जुल्म के खिलाफ आवाज बुलंद करने के लिए प्रेरणा देती हैं।
कहीं-कहीं यह भी मान्यता है कि लड़कियों की शादी रात को ही करा दी जाती थी और तारों की छांव में विदा कर दिया जाता था ताकि मुगलों को पता ना चले। जहां सारे शुभ कार्य दिन के उजाले में होते हैं फिर यह शादियां रात को क्यों होती हैं और तारों की छांव में ही विदा कर दिया जाता था लड़कियों को। यह सब दुल्ला भट्टी अपनी निगरानी में करते थे। ऐसे नेक दिल इंसानों को युगो युगो तक उनके काम के लिए याद करते हैं और करते रहेंगे।
आप सभी को लोहड़ी पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं! 🙏🏻🙏🏻
गीता ठाकुर दिल्ली से
प्रतियोगिता हेतु
Reyaan
18-Jan-2024 10:42 AM
Nice one
Reply
Shnaya
17-Jan-2024 11:16 PM
Nice one
Reply
Varsha_Upadhyay
14-Jan-2024 12:36 PM
Nice
Reply