लेखनी कहानी -17-Jan-2024
शीर्षक - जब तक सांस तब तक आस
जिंदगी में हम सबको केवल एक ही बाद जीवित रखती है उम्मीद जिसको हम कभी-कभी यह भी कह देते हैं कि जब तक सांस तब तक आस रहती है। आज की कहानी भी कुछ ऐसी ही है बहुत ही खुशहाल परिवार के साथ जुड़ी यह कहानी है कुछ सच और कल्पना के साथ परंतु हकीकत कहती सी प्रतीत होती है क्योंकि कहानी भी हम सभी के जीवन की घटित घटनाओं के साथ मन और भावों के साथ घूमती है जीवन निरंतर चलता रहता है और बस वह भी यही कहता है जब तक सांस तब तक आस है।
कहानी रामनगर के एक गांव की हंसते खेलते परिवार से शुरू होती है। रानी और निरंजन दोनों पति-पत्नी की एकमात्र संतान अमन जो की बहुत ही हंसमुख और होनहार लड़का था। और रानी जो निरंजन अपने परिवार में बहुत खुश थी और कभी-कभी तो हमारे सुखी परिवार को किसी की नजर ना लग जाए ऐसा वह कभी-कभी सोचते थे क्योंकि निरंजन प्राइवेट नौकरी में दो वक्त की रोटी को जरूर सरकार लेता था और अपने बेटे को कंप्यूटर के साथ-साथ एक रोजगार के रूप में उसको एक संस्थान चलाने की इच्छा के साथ अमन बीसीए कर रहा था। और जीवन में कल किसने देखा है बस निरंजन भी यही सोचता था जब तक सांस है जब तक आह है। अमन ना जाने पंख लगा कर बड़ा होना बालक हो गया और बीसीए पूरा करने के आखिरी सेमेस्टर में था तभी उसकी बाय कूल्हे पर एक छोटी सी फुंसी निकली।
निरंजन और रानी को अपने बेटे की फुंसी की चिंता होने लगी और वह एक दिन अपने बेटे को लिए लेबोरेट्री पर पहुंच गए। करोना के समय में सभी काम बड़ी पाबंदी के साथ होते थे। फिर भी निरंजन और रानी के संबंधों की वजह से अमन बेटे की फुंसी का परीक्षण हुआ और उसे परीक्षण में निरंजन और रानी के जमीन की तरह धरती निकल गई। जब परीक्षण रिपोर्ट में कैंसर का शक आया। और डॉक्टर ने कहा जब तक सांस तब तक आस है। करोना काल में रानी और निरंजन कैंसर का इलाज कराने दर व दर डॉक्टर पर डॉक्टर और सारी जमा पूंजी को पानी की तरह बहा दिया परंतु डॉक्टर ने दिन-ब-दिन इलाज के दौरान अपने हाथ खड़े कर लिए और एक दिन ऐसा आया रानी और निरंजन को डॉक्टर ने अपने चेंबर में बुलाकर एकमात्र सहारा अमन के जिंदगी के दिन बता दिए। रानी और निरंजन ना जिंदा थे न मरे हुए। डॉक्टर ने उनकी बेटे की मृत्यु की तारीख तय कर दी थी। डॉक्टर ने बताया अमन को चौथी स्टेज का कैंसर है और दुनिया का कोई भी डॉक्टर उसे नहीं बचा सकता जो दिन उसके है उसे खुशी-खुशी जी लेने दो रानी और निरंजन बुरा हाल था बस जब तक सांस तब तक आस थी। और एक सुबह की भोर में एकमात्र अमन 22 वर्ष का बेटा कैंसर की जंग हार गया और रानी निरंजन जिंदगी को पकड़ते रह गए।
एकमात्र बेटे की मृत्यु के बाद रानी और निरंजन दोनों जिंदा लाश बन गए थे और लोगों ने उनको सांत्वना दी। बस लोगों का एक ही तकिया कलाम जब तक सांस तब तक आस है। रानी और निरंजन अपनी जिंदगी की जंग जंग को लड़ते रहे और उन्होंने अपने जीवन में नहाते हुए आईवीएफ के द्वारा एक बेटी को जन्म दिया बस जब तक सांस है तब तक आज यही कह सकते हैं जिंदगी जिंदा दिली का नाम है गम के साथ भी और गम के बाद भी जिंदगी जीनी पड़ती है बस यही जब तक सांस तब तक आस है कह सकते हैं।
नीरज अग्रवाल चंदौसी उ.प्र
Shnaya
22-Jan-2024 12:16 AM
Very nice
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नंदिता राय
22-Jan-2024 12:15 AM
Nice
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Sushi saxena
21-Jan-2024 11:01 PM
Nice
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