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नारियों का देश प्रेम जज्बा

ई परिचय पत्रिका के जनवरी माह के अंक में
विषय - रंग देशभक्ति के
शीर्षक - नारियों का देश प्रेम जज्बा 
विधा - कहानी
लेखिका- ©अनिला द्विवेदी तिवारी
जबलपुर मध्यप्रदेश 


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देश प्रेम का जज्बा किसी साधन सुविधा, रुपए पैसे या धन दौलत का मोहताज नही होता। यह तो वह जज्बा है जो मिट्टी के कण कण में पैदा हो जाता है।
रोटियों की थाप पर पैदा हो जाता है। चूड़ियों की खनक पर पैदा हो जाता है।
यह देश प्रेम का जज्बा उम्र, लिंग, जाति, धर्म, व्यवसाय, या किसी भी प्रकार की बाध्यताओं का मोहताज नही होता।
देश के लिए सर कटा देने वाले बलिदानियों की शौर्य गाथाएं तो सबने बहुत सुनी होंगी आज हम एक ऐसी छोटी  सी कहानी आपको बताएंगे, जो यह साबित करती हैं की देश प्रेम किन-किन तरीकों से किया जा सकता है।
कितने ही लोगों ने देश की स्वतंत्रता में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तरीके से देश प्रेम में अपना अमूल्य योगदान प्रदान किया है।

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कंचन, रामरती, गीता, उर्मिला, राधा, सरोज, मालती, उमा, रुक्मणि, माया, मीना, लक्ष्मी, सावित्री, सुधा, कला, पार्वती, गोदावरी, मीरा अहिल्या, रजनी, अनुसुइया, क्रांति व अन्य।
ये कुछ (लगभग पच्चीस-तीस) महिलाएं मिलकर देश भक्ति की एक अलग ही परिभाषा गढ़ रहीं थी।
इनकी इस टोली में हर उम्र वर्ग (दस वर्ष से साठ वर्ष तक) की महिलाएं और लड़कियां शामिल थीं और इनका साथ देते थे गांव के चार-छः नौजवान,,, मोहन, हरकू (हरिहर), जगत,  दीनू (दिनेश) और अन्य कई।
स्वतंत्रता आंदोलन जोरों पर था... इन महिलाओं की टीम लीडर थी अंठावन वर्षीय  गोदावरी।

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गोदावरी,,, "अरी लक्ष्मी, मीना, पार्वती तुम सारी औरतन (औरतों) और लडकियन (लड़कियों) को आज की दोपहरी में राधा काकी के दहलान (बड़ा सा खुला कमरा) में इकट्ठा कर लो। जब हमारे सब मर्द लड़का अपने-अपने काम पर चले जांय।
बहुत जरूरी बात करन का (करना) है! भाइयों की कुछ खबर आई है।"

मीना,,, "काहे काकी कोई बात हुई का?"

गोदावरी,,, "अरे ना रे बिटिया, कुछ हुआ ना है, चिंता की कोई बात ना है।
कोई पत्र आया है भाइयों का। बस वही सबके सामने पढ़ने का है और जबाव लिखा जाएगा और जो भी आगे के काम होंगे उसके बारे में मिल-बैठ कर विचार कर लेबेंगे।"

मीना,,, "ठीक है काकी, हम सबको अभी बताए देते हैं, जिससे वे सब जल्दी से अपने-अपने काम कर लें और दो बजे तक फुरसत हो जाएं।
दो बजे हम सब राधा काकी की दहलान में मिलते हैं।
दोपहर दो बजे सब महिलाएं और लड़कियां राधा काकी के बरामदे में एकत्रित हो गईं।

पत्र की हेडलाइंस थीं... "सब मंगल है..."

ये इन पत्रों का कोड वर्ड होता था यदि सब कुछ ठीक ठाक रहता था तो..."सब मंगल है...!"
यदि किसी तरह की परेशानी रहती थी तब..."असुविधा के लिए खेद है...!"

सभी  माताओं बहनों को शुभेच्छा।
आशा है आप सब कुशल होंगे। हम आपको सूचित करना चाह रहे हैं कि हमें दो नौजवानों की तत्काल आवश्यकता है। जिनको जाकर "वंदे भारत" और "शौर्य गाथा" में कुछ सामग्री पहुंचानी होगी।
(इनके पांच शिविरों के नाम... जय जवान, वन्दे भारत, शौर्य गाथा, अपना वतन, देश का गौरव थे)।

काम जोखिम पूर्ण है सामान में कुछ मुद्राएं और कुछ अनार (बॉम्ब) भेजना है।
जैसा भी आपका फैसला हो अतिशीघ्र  किशन से जबाव देवें।
                                       शुभेच्छा 
                                 वतन के सिपाही
                                       
जबावी पत्र

सभी भाइयों को 
         हम सभी बहनों का राम-राम

हमारे सिपाही हर वक्त जंग के लिए तैयार हैं। जब भी भेजना हो हमें सूचित कर दें।
                          
                                     जय हिंद
                               देश की वीरांगनाएं

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गोदावरी,,, "सब बिटियाओं और बहनों हमें जो भी सहायता राशि, धन या खाद्य सामग्री भेजना है, दो दिन के अंदर यहीं इकट्ठी कर लो।"
लक्ष्मी, मीना, पार्वती, सुधा ये तुम्हारी जिम्मेदारी है। तुम पढ़ी लिखी भी हो और भाग दौड़ में भी अभी सक्षम हो।
चारों बालाएं पढ़ी लिखी होने के साथ-साथ अभी मध्य उम्र के पड़ाव में थीं इसलिए गोदावरी काकी को इनसे परिपक्वता की भी अधिक उम्मीद थी।

इन पच्चीस-तीस महिलाओं में से कुछ के घर से पिता, भाई, पति या बेटा अंग्रेजों की चाटुकारिता में शामिल था इसलिए इन सबको उनसे छुप, छुपाकर अपना आंदोलन और गतिविधियों को अंजाम देना पड़ता था।
इसीलिए इन महिलाओं ने एक भजन मंडली और जगराता की टोली बनाकर रखी थी ताकि बाहर आने-जाने में अपने-अपने घरों पर कुछ तो बता सकें।
इनकी भजन मंडली को अच्छी आमदनी भी होती थी, जब ये शहरों में अपनी प्रस्तुति देती थीं।
दो दिन बाद हर घर से चार-चार रोटियां अचार और गुड़, कुछ नगद पैसे और चार महिलाएं कुछ जेवर लाईं थी।

गोदावरी,,, "अरे बिटियाओं ये अपना पायल, माला, करधनी, कुंडल मत देओ रे!
जितना पैसा इकट्ठा हुआ है हम उतना ही भेज देबेंगे।"
चारों (रजनी, क्रांति, सरोज, मालती) ने समवेत स्वर में कहा,,, "काकी ये जेवर तो फिर बन जाबेंगे। जब हम अपने देश से इन गोरे फिरंगियों को खदेड़ने में कामयाब हो जाबेंगे।
देखती नही हो कैसा ये नीच, हम औरतों को देखते ही कौन-कौन सी हरकतें करते हैं! अरे हम गुलाम हैं तो का हमारी इज्जत भी गुलाम है!"

कुल मिलाकर क्रांतिकारियों ने जो गांव के जंगल के खंडहर में अपना अस्थायी शिविर बनाकर रखा था, उनका खाना खर्चा ये महिलाएं ही उठा रहीं थी और हर जरूरत की साधन सामग्री उन्हें समय-समय पर मोहन, हरकु, जगत और दीनू से भेजती रहतीं थी।
जिससे सिलाई बनती थी वे उनको पहनने के कपड़े भी तैयार करके भेजती थीं।
ये महिलाऐं साधन संपन्न घरों से थीं इतना सामग्री उन्हें उपलब्ध करा रहीं थी कि इनकी मदद से अन्य चार और जगह शिविर चल रहे थे। 

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अगले रोज मालती का पति दौलत, मालती से झगड़ने लगा और बोला,,, "करधनी लाओ मुझको कुछ काम है उसको बेचकर मुझे खेती के लिए कुछ सामान लाना है।" (शायद उसको भनक लग गई थी)।

मालती भी जिद पर अड़ी थी। "कोई करधनी न दूंगी मैं समझा तू। और ये खेती का कौन सा सामान लाबेगा? जरा मुझे भी तो बता दे? बीज घर मे है, खाद घर में है, हल बैल घर में हैं...!
जो तू ये फिरंगियों के साथ बैठकर चिलम और शराब फूंकता है क्या मुझे पता नही है! शराबी कहीं के हटो मेरे रास्ते से।" मालती ने भी चीखते हुए कहा।

दौलत ने मालती को पीटना चालू कर दिया,,, "बेहया करधनी बक्से में नही है मैं देख चुका हूँ, बता तू अपने किस आशिक को देकर आई है?"
मालती,,, "मेरी करधनी कहीं गिर गई है तीन दिन हो गए और हाँ अक्ल के अंधे कोई मर्द करधनी नही पहनता जो आशिक को दूंगी। और दूसरी बात तू अपने जैसे मुझे भी ना समझ जो किसी को  भी देखकर अपनी नीयत खराब करता है समझा।"
जैसे ही मालती पर दौलत हाथ उठाने को हुआ तभी गोदावरी काकी ने आकर हाथ पकड़कर झटक दिया और बोलीं...
"मालती की करधन मुझे पनघट पर मिली है, दो दिन हो गए, पर मैं इसलिए चुपचाप रखे हुए थी कि जिसकी होगी वह जब ढूंढबेगा तब मैं उसे दे दूंगी। और हाँ अब मालती को हाथ ना चलाइयो।"

"बुढिया तू जा अपना घर देख, तूने गांव भर की औरतों को बिगाड़ कर रखा है! चल हट यहां से!" दौलत गुस्से से ऐसा कहते हुए गोदावरी को दीवार की ओर धकेल दिया।
गोदावरी काकी गिरने ही वाली थीं  तभी अन्य आठ-दस महिलाएं आकर काकी को सम्हाल लेती हैं और दौलत की जी भर के कुटाई कर देती हैं।

गोदावरी काकी ने कहा,,, "अब छोड़ भी देओ बेटियों इसको, जान थोड़ी ही लेनी है इसकी!"
"और तू दौलत, कान खोलकर सुन ले, अब से तूने यदि मालती पर हाथ उठायो तो तेरी खैर नही! अबकी बार मैने इनको रोक लियो है, पर हर बार मैं नही रोकबूंगी।
मालती मेरी बेटी है और इन सबकी बहन है। ट्रेलर तो तूने देख ही लियो है!"

दौलत  पैर पटकता हुआ घर से बाहर निकल जाता है।
तब मालती ने काकी से पूछा,,,  "काकी ये करधनी...!"
मालती की बात पूरी होने से पहले ही काकी ने जबाव दिया... "बिटिया तुम चारों के जेवर हमनें नही भेजे थे। क्रांति और सरोज का तो ठीक है पर तुम्हारी और रजनी की हालत का हमको पता था कि शराबी पति कब तांडव चालू कर देंगे कोई भरोसा नही इनका!"

काकी ने आगे कहा,,, "बिटिया हरकू और दीनू को भेजकर हमने अपने जेवर गिरवी रखवा दिए हैं। मेरे कोई आगे पीछे नही है, हिसाब-किताब रखने वाला, इसलिए मुझे दिक्कत नही होगी।  
और भाइयों को भी अभी कोई दिक्कत नही है पर्याप्त धन मिल चुका है उन्हें अभी। हमारे ही जैसी अन्य कई जगहों से वीरांगनाएं मदद करती हैं।
क्रांति तुम भी अपने कुंडल ले जाना और रजनी और सरोज को भी बोलना अपने अपने पायल और माला ले लेंगी मेरे पास आकर।"

रजनी,,, "काकी  लेकिन हम लोगों का भी तो थोड़ा योगदान होने देती।

गोदावरी,,, "योगदान ही है बिटिया जो तुम लोग रोज रोटी बनाकर देती हो। रोटी से बड़ा योगदान तो कुछ भी नही है...!
रोटी जब पेट में जाती है, तभी कुछ करने की ताकत आती है।
अच्छा अभी मैं चलती हूँ, तुम सब भी अपना-अपना काम करो।"

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एक सप्ताह बाद काकी ने मोहन और जगत को क्रांति के जंग-ए-मैदान में भेज दिया था।
अनारों ने अपना रंग भी दिखा दिया था गोरे फिरंगियों की टोली में काफी हताहत हुए थे कुछ प्रभु को भी प्यारे हो चुके थे।
फिरंगियों में हलचल मच गई थी जगह-जगह नाका बंदी और जांच-पड़ताल चालू हो चुकी थी।
लौटते समय मोहन और जगत खाली हाथ थे, इसलिए इन्हें किसी दिक्कत का सामना नही करना पड़ा था।
परंतु अंग्रजों  के किसी मुखबिर ने  खंडहर में क्रांतिकारियों के छुपे होने की खबर अंग्रेजों को पहुंचा दी थी! अतः फिरंगियों ने वहां पर धावा बोल दिया था। अचानक से हुए इस हमले से क्रांतिकारी सतर्क नही थे। वे पिछले दरबाजे से किसी तरह कूदकर जंगल की तरफ जान बचाकर भागे परंतु दो लोग बीच में ही फंसे रह गए थे। जब वे भागने लगे तो अंग्रेज सिपाहियो ने गोली चलाई तब उन दोनों क्रांतिकारियों के सामने मालती और गोदावरी काकी आ गईं। 
गोदावरी काकी जोर से चिल्लाई,,, "भाग जाओ जल्दी। अलख जलती रहे...। जय हिंद, वन्दे मातरम्!"

गोदावरी काकी और मालती ने देश के लिए अपनी आहुति दे दी थी!
काकी और मालती की मौत से पूरे गांव की महिलाएं और पुरुष फिरंगियों पर टूट पड़े थे अतः उस समय उन्हें जान बचाकर वहां से किसी तरह से भागना पड़ा था।

वाकी वीरांगनाएं अब और अधिक चौकस हो गईं थी।
उन दोनों महिलाओं की मौत से क्रांतिकारी और भी उग्र हो चुके थे और हमले पर हमले किए जा रहे थे। अब अंग्रेज आला कमान भी थकने लगे थे इसलिए नरम दल के नेताओं को बुलाकर एक मीटिंग रखी और देश की स्वतंत्रता के लिए विचार विमर्श करके हस्ताक्षर किए।
हमारा देश स्वतंत्र हो चुका था परंतु स्वतंत्रता की अलख ने कई कुर्वानियां ले ली थीं।
जब देश आजाद हो गया तब इन सभी वीरांगनाओं और इनके ही जैसी अन्य शहरों व कस्बों की सभी वीरांगनाओं को भारत सरकार द्वारा सम्मानित किया गया और उन सभी के बच्चों को सरकारी  नौकरियाँ प्रदान की गई।


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7 Comments

Mohammed urooj khan

30-Jan-2024 12:06 PM

👌🏾👌🏾👌🏾👌🏾

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Alka jain

28-Jan-2024 04:49 PM

Nice

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Milind salve

28-Jan-2024 04:42 PM

Nice one

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