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लेखनी प्रतियोगिता -14-Feb-2024 बसंत पंचमी



शीर्षक = बसंत पंचमी



बसंत ऋतू सबसे अच्छी ऋतू में से एक ऋतू है चारो और हरियाली ही हरियाली नजर आती है, सरसों के खेत में मानो कोई पीली चादर सी बिछ जाती है।


इतना ही नही दरख़्त इस तरह हरे भरे हो जाते है पतझड़ के बाद मानो एक अँधेरी रात के बाद उनके जीवन में भी नई भोर का उदय हुआ हो।


भारत देश इसे यूँही अतुल्य नही कहा जाता है क्यूंकि इसके पास वो सारी ऋतू है जो कि अन्य देशो के पास नही है अलबत्ता भारत के कुछ हिस्सों में थोड़ा कम आभाव होता है हर ऋतू का लेकिन ज्यादातर हिस्सों में रहने वाले लोग हर ऋतू का आंनद भर पूर लेते है


जिसमे हमारा शहर और हमारा राज्य भी आता है जहाँ हर ऋतू हर मौसम अपनी कृपा हम लोगो पर बड़े अच्छे से बरसाता है।


गर्मी की बात की जाये तो अच्छी खासी गर्मी भी पड़ जाती है कि सर्दी कि याद आने लगती है और ज़ब सर्दी पड़ती है तो सर्दी इतनी पड़ जाती है कि गर्मियों की याद दिला जाती है बारिश का तो कुछ कहना ही नही ज़ब चाह होती है तब होती नही और जब होती है तो घरों में पानी घुस जाता है इस बार भी इतनी बारिश हुयी की नगरपालिका वालो को पानी खींच कर निकालना पड़ा।


अब बात करते है बसंत ऋतू की लेकिन उससे पहले पतझड़ की बात करते है पतझड़ ज़ब पेड़ो पर लगे पत्ते अपनी अवधि पूरी कर डाल से स्वयं गिरने लगते तब पेड़ बिलकुल नग्न अवस्था में आ जाते है किसी किसी पेड़ पर तो एक भी पत्ता नही रहता अब तो बड़े आंगन नही है घरों में ज़ब हम छोटे थे और हमारे घर भी एक बड़ा सा आँगन था जिसमे काफ़ी पेड़ लगे हुए थे तब इतना कूड़ा होता था कि कुछ कहा नही जा सकता

हर थोड़ी थोड़ी देर बाद पत्ते गिर जाते कभी कभी तो हमें गुस्सा आता तो हम पेड़ को हिलाकर एक बार में ही सारे पत्ते गिरा देते लेकिन उसके बाद भी बहुत सा कूड़ा हो ही जाता आस पड़ोस के पेड़ से भी कूड़ा हमारे ही आँगन में आ जाता


लेकिन फिर आता बहार का मौसम बसंत का मौसम धीरे धीरे पेड़ो पर नई कोपल निकलती इसी के साथ खेत में लगी सरसों अपने उरूज पर आ जाती ऐसा लगता मानो किसी ने धरती पर पीले फूलों कि चादर डाल दी उसी के साथ गेहूं में बाली भी आ जाती हरे पीले खेत कुछ मन को भाते है

पाखड़ का पेड़ जिसपर छोटी छोटी गोलियों की तरह फल सा आता है जिसे खोलने पर उसमे चीटिया निकलती है पेड़ो पर लध जाता है और उसी ले साथ उस पर ज़ब पत्तियाँ आती है तो कुछ खूबसूरत लगने लगता है उसका दरख़्त उसके पत्ते तीन रंगों में परिवार्तित होते है पहले हलके भूरे फिर हल्का हरा और उसके बाद डार्क हरा एक ही पेड़ पर तीन तीन तरह के पत्तों से लद्दा पाखड़ का पेड़ बहुत ही प्यारा लगता है

चारो और हरियाली ही हरियाली आ जाती है और उस पर वो ठंडी हवा जिस पर एक कवि ने कविता भी क्या खूब लिखी है




हवा हूँ, हवा मैं
बसंती हवा हूँ।

        सुनो बात मेरी -
        अनोखी हवा हूँ।
        बड़ी बावली हूँ,
        बड़ी मस्तमौला।
        नहीं कुछ फिकर है,
        बड़ी ही निडर हूँ।
        जिधर चाहती हूँ,
        उधर घूमती हूँ,
        मुसाफिर अजब हूँ।

न घर-बार मेरा,
न उद्देश्य मेरा,
न इच्छा किसी की,
न आशा किसी की,
न प्रेमी न दुश्मन,
जिधर चाहती हूँ
उधर घूमती हूँ।
हवा हूँ, हवा मैं
बसंती हवा हूँ!


        जहाँ से चली मैं
        जहाँ को गई मैं -
        शहर, गाँव, बस्ती,
        नदी, रेत, निर्जन,
        हरे खेत, पोखर,
        झुलाती चली मैं।
        झुमाती चली मैं!
        हवा हूँ, हवा मै
        बसंती हवा हूँ।

चढ़ी पेड़ महुआ,
थपाथप मचाया;
गिरी धम्म से फिर,
चढ़ी आम ऊपर,
उसे भी झकोरा,
किया कान में 'कू',
उतरकर भगी मैं,
हरे खेत पहुँची -
वहाँ, गेंहुँओं में
लहर खूब मारी।


        पहर दो पहर क्या,
        अनेकों पहर तक
        इसी में रही मैं!
        खड़ी देख अलसी
        लिए शीश कलसी,
        मुझे खूब सूझी -
        हिलाया-झुलाया
        गिरी पर न कलसी!
        इसी हार को पा,
        हिलाई न सरसों,
        झुलाई न सरसों,
        हवा हूँ, हवा मैं
        बसंती हवा हूँ!

मुझे देखते ही
अरहरी लजाई,
मनाया-बनाया,
न मानी, न मानी;
उसे भी न छोड़ा -
पथिक आ रहा था,
उसी पर ढकेला;
हँसी ज़ोर से मैं,
हँसी सब दिशाएँ,
हँसे लहलहाते
हरे खेत सारे,
हँसी चमचमाती
भरी धूप प्यारी;
बसंती हवा में
हँसी सृष्टि सारी!
हवा हूँ, हवा मैं
बसंती हवा हूँ!


इस कविता को जितनी बार पढो प्यारी ही लगती है, उसी के साथ आम पर बोर आने लगता है कोयल की आवाज़ दूर दराज के इलाकों से आने लगती है

सर्दी और कोहरे की मार से सूखे वृक्ष फिर से हरियाली की और लौटने लगते है उसी के साथ हमारे मोहल्ले में बने होली चौक पर होली का बसंत रख जाता है और फिर हर दिन वहां लकड़ी, उपले वगैरह रखे जाते है ताकि होली तक उसे पूरा भर सके


उसी के साथ शुरुआत होती है अजीब तरह के कीट पतंगों की जो पीली चीज को देख कर अत्यधिक मोहित हो उठते है कई बार तो लोगो की आँखों में गिरकर बड़ी दुर्घटना कर देते है वो भी इस तरह चारो और घुमते दिखाई देते है मानो बसंत का आंनद ले रहे हो और फिर होली के बाद वो नजर नही आते है



तो इस तरह का होता है वसंत ऋतू का आगमन इस ऋतू से एक सीख हमेशा लेनी चाहिए कि कोई भी चीज हमेशा नही रहती पतझड़ के बाद बसंत अवश्य आता है


समाप्त....
प्रतियोगिता हेतु....

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3 Comments

Shnaya

17-Feb-2024 10:45 PM

Nice one

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Gunjan Kamal

15-Feb-2024 09:38 PM

शानदार प्रस्तुति

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बहुत सुंदर 👌👌👌

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