चन्द्र शेखर आजाद
सच्चा धर्म वही है जो स्वतंत्रता को परम मूल्य की तरह स्थापित करे। “दुश्मन की गोलियों का सामना हम करेंगे, आजाद हैं, आजाद ही रहेंगे।” अगर अभी भी तुम्हारा खून नहीं खौला तो यह खून नहीं पानी हैं। ऐसी जवानी किसी काम की नहीं जो अपनी मातृभूमि के काम न आ सके।
चंद्रशेखर आजाद का असली नाम चंद्रशेखर तिवारी था। असहयोग आंदोलन के दौरान उन्होंने अपने नाम के आगे आजाद जोड़ लिया। चंद्रेशेखर आजाद ने प्रण लिया था कि वह जीते जी अंग्रेजी हुकूमत के हाथों नहीं आएंगे।
ये क्रांतिकारी विचार रखने वाले महान देशभक्त चन्द्र शेखर आजाद को भारत हमेशा याद रखेगा।
चंद्रशेखर आजाद का कहना था, 'मेरा नाम आजाद है, मेरे पिता का नाम स्वतंत्रता और मेरा घर जेल है'. चंद्रशेखर आजाद के क्रांतिकारी विचारों से प्रभावित होकर उस समय कई युवाओं ने देश की आजादी की लड़ाई में अपना योगदान दिया था। चंद्रशेखर आजाद के विचार आज भी लाखों लोगों को प्रेरणा देते हैं।
आजाद ही रहे हैं, आजाद ही रहेंगे: चंद्र शेखर आजाद का यह नारा अमर है।
यदि कोई युवा मातृभूमि की सेवा नहीं करता है, तो उसका जीवन व्यर्थ है।
अगर आपके लहू में रोष नहीं है, तो ये पानी है जो आपकी रगों में बह रहा है। ऐसी जवानी का क्या मतलब अगर वो मातृभूमि के काम न आ सके।
दूसरों को खुद से आगे बढ़ते हुए मत देखो। प्रतिदिन अपने खुद के कीर्तिमान तोड़ो, क्योंकि सफलता आपकी अपने आप से एक लड़ाई है।
मैं ऐसे धर्म को मानता हूं, जो स्वतंत्रता समानता और भाईचारा सिखाता है।
चिंगारी आजादी की सुलगती मेरे जिस्म में हैं। इंकलाब की ज्वालाएं लिपटी मेरे बदन में हैं। मौत जहां जन्नत हो यह बात मेरे वतन में है। कुर्बानी का जज्बा जिंदा मेरे कफन में है।
आज भी लहू में उबाल पैदा कर देता है।
चंद्रशेखर आजाद की मौत के बाद उनकी पिस्तौल का क्या हुआ??
चंद्रशेखर आजाद की पहचान उनकी लंबी-चौड़ी कद-काठी के साथ-साथ उनकी कॉल्ट पिस्तौल भी थी। चंद्रशेखर आजाद ने इसी पिस्तौल से ही अल्फ्रेड पार्क में अंग्रेजों से लोहा लिया था और आखिर में खुद को गोली मारकर शहीद हो गए थे। चंद्रशेखर आजाद के खिलाफ पुलिस के ऑपरेशन का नेतृत्व अंग्रेजी पुलिस ऑफिसर नॉट बावर कर रहे थे।
चंद्रशेखर आजाद की जीवनी लिखने वाले उनके साथी विश्वनाथ वैशम्पायन ने लिखा नॉट बावर के रिटायर होने के बाद अंग्रेज सरकार ने आजाद की कोल्ट पिस्तौल अंग्रेज ऑफिसर को गिफ्ट की गई थी।
नॉट बावर चंद्रशेखर आजाद की पिस्तौल को इंग्लैंड लेकर चले गए थे। देश आजाद होने के बाद इलाहाबाद के कमिश्नर मुस्तफी ने नॉट बावर से पिस्तौल लौटाने के लिए चिट्ठी लिखी। नॉट बावर ने इसका जवाब नहीं दिया। मुस्तफी बाद में लखनऊ यूनिवर्सिटी के कुलपति बने। लंदन स्थित भारत के हाई कमीशन ने ये पिस्तौल वापस लाने की कोशिश की थी।
नॉट बावर ने कहा, “यदि भारत सरकार द्वारा उन्हें लिखित अनुरोध किया जाएगा तो वह ये पिस्तौल वापस लौटा देंगे।”
चंद्रशेखर आजाद को अपनी पिस्तौल से बहुत लगाव था। आखिरी वक्त तक ये पिस्तौल उनके पास थी।
भारत सरकार ने नॉट बावर की शर्त मान ली थी। चंद्रशेखर आजाद की कॉल्ट पिस्तौल, मौत के 42 साल बाद 1972 में भारत वापस लौट आई।
इसके बाद फरवरी 1973 में इसे लखनऊ स्थित संग्राहलय में रखा गया था। इस समारोह की अध्यक्षता शचींद्रनाथ बख्शी ने की थी। आगे चलकर इसे इलाहाबाद संग्रहालय में विशेष कक्ष में लाकर रखा गया।
ऐसे महान विचारक क्रांतिकारी देशभक्त को शत-शत नमन 🙏🙏
स्वरचित-सरिता श्रीवास्तव "श्री"
धौलपुर (राजस्थान)
Mohammed urooj khan
28-Feb-2024 12:47 PM
👌🏾👌🏾👌🏾
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Gunjan Kamal
28-Feb-2024 12:45 PM
👏👌
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hema mohril
28-Feb-2024 08:35 AM
V nice
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