Sadhana Shahi

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लेखनी कहानी -24-Mar-2024

2-कामदेव और देवाधिदेव महादेव के क्रोध की कथा


हिमालय राज की पुत्री देवी पार्वती देवाधिदेव महादेव से विवाह करना चाहती थीं। किंतु देवाधिदेव महादेव तपस्या में लीन थे ,उस समय तारकासुर पूरी धरा पर आतंक मचाया हुआ था। देवतागण इस बात से भली-भांँति परिचित थे कि ब्रह्माजी के वरदान के चलते तारकासुर का मर्दन देवाधिदेव महादेव के पुत्र के अतिरिक्त किसी और के द्वारा किया जाना संभव नहीं है। तब देवताओं ने कामदेव को उनकी तपस्या भंग करने की ज़िम्मेदारी दिया और कामदेव ने यह जोख़िम भरा कदम उठाया। कामदेव 8 दिन तक शिव जी की तपस्या को भंग करने का हर संभव प्रयास किए किंतु उनके सारे प्रयास विफल साबित हुए तब अंततः उन्होंने शिव जी के ऊपर प्रेम बाण चलाया, बाण लगते ही शिव जी की तपस्या भंग हो गई और वे इतने क्रोधित हुए कि अपना तीसरा नेत्र खोल दिए।

फल स्वरुप उनके क्रोधाग्नि में जलकर कामदेव का शरीर पूर्णतः नष्ट हो गया। जिस दिन शिव जी ने कामदेव को नष्ट किया उस दिन फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि थी और इसके पूर्व के 8 दिन कामदेव ने भगवान शिव की तपस्या को भंग करने का प्रयास किया था। अतः इसे होलाष्टक के रूप में मनाया जाता है और इन दिनों कोई भी शुभ कार्य करना वर्जित होता है।

अपने पति कामदेव को इस प्रकार भस्म हुआ देखकर उनकी पत्नी रति विलाप करने लगी और उसने भगवान शिव को अपनी पूजा से प्रसन्न कर यह बताया कि कामदेव निर्दोष थे उन्होंने देवताओं के कहने पर ऐसा किया तथा साथ ही वो माता पार्वती की मदद कर रहे थे। तब भगवान शिव ने पार्वती की तरफ़ देखा और उन्हें अपने पत्नी के रूप में सहर्ष स्वीकार कर लिया। इस प्रकार माता पार्वती की तपस्या और आराधना सफ़ल हुई। रति की बात को सुनकर भगवान भोलेनाथ को अपनी ग़लती का एहसास हुआ और उन्होंने कामदेव को अगले जन्म में श्रीकृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न के रूप में जन्म लेने का वरदान दिया। माना जाता है कि भगवान शिव की तपस्या भंग होने की खुशी में सभी देवताओं ने रंगोत्सव मनाया तभी से होली का पर्व मनाया जाने लगा। यही कारण है कि प्राचीन काल में मानव होलिका कीअग्नि में अपने वासना के आकर्षण को प्रतीक रूप में जलाकर भस्म कर देता था और अपना मन पूर्णतया स्वच्छ कर लेता था। आज भी हमें होलिका दहन में सिर्फ लकड़ियों का ढेर न जलाकर अपने मन की वासनाएंँ जलाकर भस्म कर देना चाहिए और अपने मन को पूर्णतया स्वच्छ कर लेना चाहिए। यदि हम ऐसा कर पाते हैं तभी होलिका दहन की सार्थकता है।

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