फ़ितरत को ज़माने की, ये क्या हो गया है
फ़ितरत को ज़माने की, ये क्या हो गया है भाई अपने भाई से, जुदा हो गया है |
रिश्तों की मर्यादा ने , सीमाएं लांघ दी हैं इंसानियत का जज़्बा , लहुलुहान हो गया है |
आधुनिकता की अंधी दौड़ में , इंसान गुम हो गया है सुविधाओं के बवंडर में , मानव कहीं लोप हो गया है |
जीवन अजीब सी दौड़ का , पर्याय हो गया है धर्म पर राजनीति का , कब्ज़ा हो गया है |
राष्ट्र के प्रति समर्पण , दिखावा हो गया है राष्ट्र के सपूतों का निरादर , आम हो गया है |
नेताओं की कुटिल चालों से घायल , आमजन हो गया है झूठ का बोलबाला , सत्य कहीं वीराने में खो गया है |
आँखों में शर्म का , अभाव हो गया है संस्कार स्वयं के अस्तित्व पर , रो रहा है |
फ़ितरत को ज़माने की, ये क्या हो गया है भाई अपने भाई से, जुदा हो गया है |
अनिल कुमार गुप्ता अंजुम
Gunjan Kamal
10-Apr-2024 02:53 PM
बहुत खूब
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Varsha_Upadhyay
29-Mar-2024 11:33 PM
Nice
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kashish
29-Mar-2024 03:23 PM
V nice
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