Sadhana Shahi

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विरासत की हकदार मैं भी हूंँ (कहानी) प्रतियोगिता हेतु28-Mar-2024

दिनांक- 28/3/2024 दिवस- गुरुवार प्रदत्त विषय-विरासत की हकदार में भी हूंँ (कहानी) प्रतियोगिता हेतु

बात उन दिनों की है जब मोहिनी आंँखों में सपने सँजोए अपने माँ- बाप, भाई- बहन, सखी- सहेली सब कुछ छोड़कर सारिका जी और मोहन की बहु और रोहिणी की भाभी बनकर उनके घर गई। लेकिन यह क्या! दो दिन भी नहीं बीते थे कि उसके सपने एक-एक करके टूटने नहीं वरन् चूर- चूर होने शुरू हो गये।

उन सपनों के टूटने की शुरुआत उसके प्रीति भोज के अगले दिन से हो गई। दरअसल हुआ कुछ यूँ कि प्रीति भोज की अगली सुबह पूरा घर बिखरा हुआ था। मोहिनी ने पूरे घर को समेट कर कपड़े इत्यादि को मोड़कर रख दिया। कमरे में झाड़ू न लगाकर कपड़े से कमरे को झाड़कर जो भी कचरा था उसको एक पन्नी में भर दिया। वह उसे फेक नहीं पाई क्योंकि उसे कमरे के बाहर निकलने की इजाज़त नहीं थी। और झाड़ू इसलिए नहीं लगाई क्योंकि उसकी जानकारी के अनुसार जब तक नई नवेली दुल्हन का पहली रसोई के रस्म की अदायगीनहीं होती है तब तक वह जूठे बर्तन और झाड़ू नहीं छूती है। अतः शाम के 4:00 बज गए थे कमरे में झाड़ू न तो किसी और ने लगाया और न ही मोहिनी ने लगाया।

तभी उसकी सासू मांँ सारिका जी कर्कश ध्वनि के साथ कमरे में प्रवेश कीं और उन्होंने देखा कि कमरे में झाड़ू नहीं लगा हुआ है, घर में जितना कचरा वगैरह था वह इकट्ठा करके पन्नी में भरकर रखा हुआ है। बस यह देखना था कि व्यंग्ग वाणों की बौछार शुरू हो गईं जो सिर्फ़ मोहिनी को ही नहीं बल्कि उसके पूरे खानदान, पूरे गांँव ,जिला सबको स्वयं में लपेटे जा रहा था।

उन्हें जो नहीं कहना चाहिए सब कुछ कह डालीं। बस अभी तीन दिन तो आए हुये,हुए थे मोहिनी को। और अपनी सासू मांँ की इतनी प्यार भरी बातों को सुनकर उसकी दुनिया तो ऐसा लग रहा था बसने के पहले ही उजड़ गई हो। वह कुछ भी सोच नहीं पा रही थी। मानो उसको सांँप सूंँघ गया हो।

सारिका जी सुना करके जब दूसरे कमरे में चली गईं तब मोहिनी यही नहीं समझ पा रही थी कि सारिका जी ने उसे किस बात के लिए यह सब कुछ सुनाया। क्योंकि उसके अनुसार तो उसको झाड़ू लगाना ही नहीं था और जो करना था वह सब कुछ उसने कर दिया था। कमरा सेट कर दिया था सारे कचरे को इकट्ठा करके उसे पन्नी में भर दिया था।

बस उस दिन से जो तानों की बौछार शुरू हुई तो दिन- प्रतिदिन बढ़ती ही गई, रुकने का नाम ही नहीं ली। समय के साथ-साथ मोहिनी गर्भवती हुई। उसे लगा शायद इस ख़बर को सुनकर उसकी सासू मांँ ख़ुश हो जाएंँगी और तानों की बौछार थोड़ी कम हो जाएगी। लेकिन यह तो उल्टा हो गया, गर्भवती होने की ख़बर सुनकर घर में और भी कोहराम मच गया।इतनी जल्दी बच्चा करने की क्या आवश्यकता थी! जानवर है जानवर थू ! गाय भैंस है, गँवार है जैसे शब्दों से उसके दिन की शुरुआत होती और इसी तरह के आशीर्वचन पूर्ण शब्दों से दिन का अंत होता था।अब इस तरह के ताने सुनना उसकी दिनचर्या में शामिल हो गया था। अब उसको परेशान करने का रोज नया- नया तरीका खोजा जाता और उसे इतना परेशान किया जाता कि वह अपने पति से कहे कि उसका पति उसे मायके छोड़ दे। किंतु ढीठ मोहिनी अपने पति से मायके जाने के लिए नहीं बोली। जब सारिका जी को अपना खेल बिगड़ा हुआ नज़र आने लगा तब वो मोहिनी के पति के आने पर घर में आतंक करने लगीं, जिससे परेशान होकर मोहिनी का पति मोहिनी को मायके छोड़ आया।और इस तरह वही हुआ जो सारिका जी चाहती थीं।

पहले तो मोहिनी किसी भी कीमत पर मायके जाने को तैयार नहीं थी। क्योंकि अब वह सोच रही थी यही मेरी किस्मत है, कितना भागूँगी लौटकर तो यहीं आना है। किंतु, अपने पति के समझाने पर वह मायके जाने को इसलिए तैयार हो गई क्योंकि मोहिनी के गर्भवती होने के कुछ समय पूर्व घर की कूटनीति में मोहिनी को पेट में चोट लग गया था जिसकी वज़ह से उसकी बच्चेदानी चोटिल थी और डॉक्टर का कहना था यदि यह बच्चा नहीं बचा तो मोहिनी भविष्य में कभी भी माँ नहीं बन पाएगी। अतः डरी हुई मोहिनी इस स्थिति में मायके जाना ही ठीक समझी और वह मायके चली गई।

मायके में ही उसका बच्चा हुआ। बच्चा होने के 6 महीने बाद वह इस उम्मीद के साथ ससुराल आई कि शायद यह बच्चा उसकी किस्मत बदल दे। लेकिन फिर वही हुआ जिसकी मोहिनी ने कल्पना नहीं किया था। अब साजिसें और भी ज़्यादा उच्च स्तर की होने लगीं। कुल मिलाकर सारिका मोहिनी तथा उसके पति को किसी भी क़ीमत पर उस घर में नहीं रहने देना चाहती थी।

अंततः मोहिनी का पति मोहिनी को लेकर दूर परदेश में चला गया और वहाँ पर पति-पत्नी दोनों प्राइवेट नौकरी करके अपना गुज़र वसर करने लगे। समय के साथ-साथ वह बच्चा बड़ा हुआ। लेकिन जब भी मोहिनी उसका पति और उसका बच्चा घर जाते उसकी सासू माँ घर में वैसे ही क्लेश करतीं और रात भर रहने में भी घर में तांडव मचा देतीं। वह नन्हा सा बच्चा वक्त के साथ-साथ बड़ा हुआ और साथ ही साथ घर में पुष्पित- पल्लवित होती गंदी राजनीति से भी वाकिफ हो गया।

जब उसे समझ में आने लगा कि मेरे मांँ-पापा ने घर छोड़ा नहीं है बल्कि उन्हें घर छोड़ने पर मज़बूर किया गया है। तब वह अपनी मांँ को उसका हक दिलाने के लिए कमर कस लिया। ग्रीष्मावकाश में दादी के घर जाने की तैयारी हो गई तब बच्चे ने अपनी माँ से कहा, मम्मी इस बार अगर कुछ हुआ तो मैं चुप नहीं रहूंँगा। मोहिनी ने अपने बच्चे को समझाया नहीं बेटा बड़ों के साथ बदतमीजी नहीं करते हैं। तब उसके बच्चे ने कहा आपने बदतमीजी नहीं किया इसलिए तो आपको अपने ही घर में नहीं रहने दिया गया। ठीक है मैं नहीं बोलूंँगा लेकिन आप के साथ यदि कोई बदतमीजी किया तो आप बोलेंगी और अगर आप नहीं बोलीं तो मैं बोलूंँगा। मोहिनी ने अपने बच्चे को बहुत समझाया- बुझाया और कहा ठीक है तुम नहीं बोलोगे मैं बोलूंँगी और गर्मियों की छुट्टियों में मोहिनी उसके पति और उसका बच्चा तीनों अपने घर गए।

हमेशा की तरह रात को पहुंँचे सुबह बवाल शुरू हुआ और बवाल की शुरुआत ही यह यहांँ क्यों आई है से हुई ।अपनी सासू मांँ और ब्याहता नंद के मुंँह से यह शब्द सुनते ही उसके मुँह से अनायास ही निकल पड़ा, क्योंकि इस विरासत की हकदार मैं भी हूँ। भागकर नहीं आई हूंँ जिस तरह आप ब्याहकर आईं हैं वैसे ही मैं भी ब्याह कर आई हूंँ।

यह क्या! मोहिनी के मुंँह से इस तरह के शब्दों को सुनकर सारिका जी, उनके पति और ब्याहता बेटी रोहिणी सब अवाक् थे।

जिस मोहिनी के मुंँह में कल तक ज़ुबान नहीं थी आज इतना कैसे बोल दी! आख़िर इसके पास इतनी हिम्मत आई कहांँ से। लेकिन मोहिनी का बेटा अंदर ही अंदर इस बात पर ख़ुश हो रहा था कि फाइनली उसकी मांँ को अपने लिए स्टेप लेना तो आया। वह अपने हक के लिए बोलना तो सीखीं। और इस तरह से वह मोहिनी जो पूरे जीवन सिर्फ़ गालियांँ, दुत्कार,ताने को ही अपनी किस्मत समझ बैठी थी अपने बेटे के दम पर अपनी किस्मत परिवर्तित कर ली। और वह उस घर के एक कमरे में ताला मारकर आई और अपने सास- ससुर,नंद को यह बात बताकर आई कि यह कमरा मेरा है और अब मैं जब चाहूँ तब आकर इस कमरे में रहूँगी और कोई भी मुझे रोक नहीं पाएगा।

सीख-एक बच्चा अपने माता-पिता की आन, बान, शान होता है। जो माँ जीवन भर ठोकरें खाती है वह अपने बच्चे के दम पर पूरी दुनिया से लड़ने का हौसला पाल लेती है। यह बात बिल्कुल ठीक है कि हमें अपने बड़ों की इज्ज़त करनी चाहिए। किंतु जब बड़े छोटों का जीना ही मुश्किल कर दें तो ऐसी स्थिति में कई बार मज़बूरी में हमें बड़ों का अनादर भी करना पड़ता है। क्योंकि कहा जाता है, जब घी सीधी उंँगली से नहीं निकलता है तो हमें उंँगली को टेढ़ा करना ही होता है।

साधना शाही, वाराणसी

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6 Comments

Mohammed urooj khan

01-Apr-2024 02:06 PM

👌🏾👌🏾👌🏾👌🏾👌🏾

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Gunjan Kamal

30-Mar-2024 10:26 PM

शानदार

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Naresh Sharma "Pachauri"

30-Mar-2024 10:41 AM

Nice

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