मर्द कभी रोता नही ।
पुरूषों को सिखाया जाता है कि पुरूष नहीं है ।
आँसू स्त्रैण हैं, मर्द कभी रोता नहीं ...
यह बात हर पचरूए पल्ले बाँध कर जीता है ।
स्त्रियों को बहुत सुविधा है कि
जब चाहे जिस बात पर चाहें रो सकती हैं ।
कोई नहीं कहता उनसे रो मत मर्द बन !
इससे अनेक कुण्ठाओं से बच निकलतीं हैं ।
रो लिया,
कलप लिया,
सर पीट लिया,
छाती पीट ली ........
घने बादल आये,
बरसे और फिर सब कुछ साफ -सुथरा !!
पुरूष इसके विपरीत तथाकथित मर्द बना रहता है ।
और अनेक प्रकार की कुण्ठाओं को पाले रहता है .....
हार्टअटैक,
डायबिटीज,
पागलपन
पुरूषों में स्त्रियों की अपेक्षा बहुत ज्यादा होतें हैं ।
आँसुओं के मामले में मैं तो बिल्कुल बिन्दास हूँ
हाँ हर बात पर रोता नहीं
लेकिन आँसू आये तो रोकता भी नहीं अकेले में ।।
कौन रोता है किसी और की ख़ातिर ऐ दोस्त
सबको अपनी ही किसी बात पर रोना आया ।।