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ज़िन्दगी के गीत ग़ज़ल गा के रहेगी





आग इन्कलाब की जला के रहेगी, 
तारीख़ अपने-आप को दोहरा के रहेगी! 

ज़िन्दगी अब मौत से टकरा के रहेगी, 
हर चीज़ काएनात की थर्रा के रहेगी! 

झपक रही हैं देर से आँखें  भी समय की, 
दुनिया को अब नींद सी कुछ आ के रहेगी! 

हर लफ़्ज़ के मा'नी-ओ-मतलब बदल गए, 
हर बात और बात हुई जा के रहेगी! 

बातों का बतंगड़ भी बनाना नहीं अच्छा, 
सौ बात की एक बात,ये बता के रहेगी! 

अफ़लाक के माथे पर हैं चिंता की लकीरें, 
ज़मीन भी अब त्योरियां चढ़ा के रहेगी! 

जब टूटे हुए साज़ से निकलेगी कोई धुन, 
तो ज़िन्दगी के गीत ग़ज़ल गा के रहेगी! 
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2 Comments

Mohammed urooj khan

25-Jun-2024 11:28 PM

👌🏾👌🏾

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Virendra Pratap Singh

27-Jun-2024 03:15 PM

शुक्रिया खान साहब।

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