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हम महकते-महकते गए

हम महकते-महकते गए
जब दरख़्तों पर पत्ते उगे,
फूल खिलते ही खिलते गए।
मन में भीनी महक जब वसंती,
हम महकते-महकते गए।।

ख़ुमारी का छाया था आलम,
बेख़बर थीं हवाएँ-फ़ज़ाएँ।
बेख़ुदी का वो आलम न पूछो,
हम बहकते-बहकते गए।।
        मन में भीनी महक.............।।

शोखियों से भरी थीं कली सब,
मस्तियों में सनी सब गली।
सुर्ख़ शाख़ों पर बैठे पखेरू,
सब चहकते-चहकते गए।।
         मन में भीनी महक.............।।

नूर था रागिनी की खनक थी,
चाँद की चादिनी थी मचलती।
शोख़-चंचल हसीना सी ऋतु में,
हम मचलते-मचलते गए।।
        मन में भीनी महक............।।

उनसे नज़रें हुईं चार जब,
वक़्त मानो ठहर सा गया।
झील के जैसे ठहराव में,
हम सरकते-सरकते गए।।
        मन में भीनी महक जब वसंती,
         हम महकते-महकते गए।।
                    ©डॉ0हरि नाथ मिश्र
                        9919446372

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2 Comments

Arti khamborkar

21-Sep-2024 09:19 AM

fantastic

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madhura

14-Aug-2024 07:43 PM

V nice

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