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दायरा कमजोरों का

जुबां पे रखते है गालियां जहान भर की,

अक्ल का बोझ खुदका, औरों पे निकाल चलते हैं 

मायने समझाते है औरों को, दो कश लगाने का
तनाव दिमाग का, वो धुएं में उछाल चलते है

संभाले भी नहीं थमते कदम अब लड़खड़ाने से
दिलों का दर्द कह के, मद हलक में उतार चलते है

बहाने हैं यकीं मानों, ये बस कमजोर लोगों के
खुद वश की बात नहीं, दोष गैरों के निकाल चलते हैं
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✍️ विजय कुमार "साहिल" 💔🥀
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4 Comments

Anjali korde

23-Jan-2025 06:05 AM

👌👌

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RISHITA

20-Jan-2025 05:41 AM

👌👌👌👌

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Arti khamborkar

19-Dec-2024 03:39 PM

awesome

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