Kumar Milind

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दर्द-ए-आज़म

Dedicated to
My Class Teacher
Sumita Kumari Singh Ma'am
who encouraged me to write this
Kartik
who often admired it
Harshh Dokania
who kept it as a challenge to me
Apurva Kaushal Thakur
who never let me down
and
To one who should not be named
for filling my barren heart with flowers of love
हमसे जो इतनी हसरत है कहीं कयामत प्यारी तो नहीं
सामान जो सारा बिखरा है कहीं जाने की तैयारी तो नहीं

आपकी उँगलियाँ जो फिर रही हैं कागज पर
बनती जो सूरत जो कहीं हमारी तो नहीं

तन्हा ही रहें हम तभी लहू गिराते हैं
बात न भी करे तब भी बेनजारी तो नहीं

हमें मालूम है कि क्या लिखा है आजम ने
उसे किसी की दाद की दरकारी तो नहीं



पास हमारे रफ़ीक़ हों, ऐसी क़िस्मत नहीं हुई,
और दुश्मनों से दुश्मनी हो जाए, ऐसी हिम्मत नहीं हुई।

पहले जितना ग़म था, अब भी उतना ही है,
यही वो शहर है, जिसमें कोई बरक़त नहीं हुई।

संग-ए-ग़म के जमने पे जम गया है लहू,
अब तो मज़ीद ख़ुशियों की मुझको ज़रूरत नहीं हुई।

आज आज़म जो है, अपने ही बल पर है,
इसमें आपकी या ख़ुदा की कोई इनायत नहीं हुई।



हुकूमत के ख़िलाफ़ ये कैसी साज़िश हो रही है,
हर इक लाश में देखिए कैसी ये जुम्बिश हो रही है।

छिप गए हैं सितारे, शम्मा बुझ गई है,
अब तो मानो तंगी से रौशनी की गुज़ारिश हो रही है।

तीर छूटे सभी कमान से, फिर भी निशाने चूक गए,
अब भी मानो तीरों पर पूरी ज़ोर-आज़माइश हो रही है।

जब से सूरज को भी शम्मा की ज़रूरत पड़ गई,
तब से आज तक, इक नए आज़म की पैदाइश हो रही है।



अश्क आँखों पे निकल आता है मुस्कुराहटों के साथ,
आसमान में उड़ते रहते हैं ज़मीनी गिरावटों के साथ।

वो चौंका देते थे जब कभी सदा से,
ठुकरा देते हम मगर, अब चाहिए वही सदा पाँव की आहटों के साथ।

वो नज़रें मिली ऐसी कि चराग़ भी जल गए,
बुझ गए चराग़, वो शराबी तरावटों के साथ।

हाथ में जाम पकड़कर मोड़ लेते थे नज़रें,
पर अब बुलंद हैं नज़ारे, आज़म की लिखावटों के साथ।



दिल में एक तस्वीर थी, हमने उसे भी जला दिया,
वो इक सदा जो आई, ये पत्थर का दिल भी गला दिया।

वो समझते हैं दीवाना जो कहता हूँ ग़ज़लें तो,
क्या करूँ, इस हक़ीक़त-ए-इल्म-ए-ग़म ने शायर भी बना दिया।

नज़रें ही गरमा सकते हैं, बात बढ़ा सकते नहीं,
अंदाज़-ए-आज़म ने बढ़कर कभी होंठ भी हिला दिया।



हर इक अश्क जो तुम बहाओगे, उसमें पाओगे मुझे,
शिकवे जब बतलाओगे, तो ख़ुद में ही पाओगे मुझे।

मेरी ज़िंदगी एक खुली किताब है,
हर सफ़ा पलटोगे तो ख़ुद में ही पाओगे मुझे।

ज़िंदगी न है फ़राज़, मिट ही जाएगी,
पर मौत मंज़िल-ए-आख़िर है, ये कैसे मनवाओगे मुझे।

हर इक सदा जो आती है, नाम है अज़म का,
न जाने क्यों दर्द में हमेशा पाओगे मुझे।



उनका अब तक यूँ ख़्वाबों में आना याद है,
छूकर उनका इस दिल को सदा लगाना याद है।

नज़र-ए-दीवानगी को अपनी ओर पाकर,
उनका हौले से वो ज़ुल्फ़ हटाना याद है।

क़लम-ए-शायर बाग़ी थी जिसके नाम से,
उनका आकर इस दिल को उसी उल्फ़त में डुबाना याद है।

लब की वो जुम्बिश पड़ गई थी कान में,
तभी से उनका वो नज़रें तिरछाना याद है।

भले ही औरों के दिल में आ ना सके वे तपाक से,
मगर उनका इस दिल में आकर जाम छलकाना याद है।

हमारी बेनज़ारी ही एक दिन को काफ़ी थी मगर,
उनका वो सहेली के कान में फुसफुसाना याद है।

साबित ना हो पाया कभी आज़म से मगर,
शायद उनको भी हमारी आज़मियत याद है।


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1 Comments

hema mohril

26-Mar-2025 04:57 AM

v nice

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