SONMER MANDIR
प्राचीन ऐतिहासिक सोनमेर मंदिर
मेरे गांव से करीबन एक किलो मिटर की दूरी पर जंगल के किनारे सोनमेर नामक एक गांव बसा हुआ है।
इस गांव में मुन्नी देवी नाम की देवी मैया का एक भव्य, सुंदर, आकर्षक एवं विशाल प्राचीन मंदिर बनी हुई है।
मंदिर के बारे में मैंने अपनी शिक्षिका तीजन बड़ाइक जी से सुनीं थी कि जब माता सती की मृत्यु उसके पिता दक्ष प्रजापति के घर में हो जाती है तब भोले नाथ मां सती को अपनी गोद में उठा कर आकाश मार्ग से कैलाश पर्वत ले जा रहे थे तब मां के शरीर का एक अंश यहीं पर गिरा था तभी से मां सती यहां मां दुर्गा के रूप में अवतरित हुई हैं।
मंदिर का इतिहास लगभग ३०० साल पुरानी है।
यह मंदिर झारखंड राज्य के खुंटी जिला के कर्रा प्रखंड में है। इस देवी मंदिर को प्राचीन ऐतिहासिक सोनमेर मंदिर के नाम से जाना जाता है। मंदिर में सालों भर (भक्त) लोग अपने -अपने मनोकामना की पूर्ति हेतु आते रहते हैं। मंदिर में बुधवार, शुक्रवार और रविवार के दिनों में अन्य दिनों के अपेक्षा बहुत भीड़ होती है । मंदिर में पूजा-अर्चना सोनमेर गांव के पहान के द्वारा किया जाता है। मान्यता है कि देवी मैया यहां से कभी किसी को भक्त को खाली हाथ (निराश) नहीं लौटाती है ं। मंदिर में भक्त अपनी मनोकामनाएं पूरी (मांगने) करने के लिए पहान के द्वारा पूजा करवाते हैं।
पहान लाल रंग के मुर्गे(रंगुवा) को अपने खुट के नाम से चरा कर पूजा संपन्न करता है। भक्त गन अपनी मनोकामना के पूर्ण होने पर देवी मां को धन्यवाद के तौर पर काले रंग के बकरे की बली दी जाती है।सोनमेर मंदिर में प्रत्येक वर्ष (आश्विन मास) अक्टूबर के महिना में दुर्गा पूजा के ठीक पांच दिन बाद शरद पूर्णिमा के दिन एक भव्य और विशाल मेला लगाया जाता है। इस मेले को लोग दसई जतरा के नाम से जानते हैं। मेला का आयोजन सोनमेर गांव के पहान ,रैयत, बड़ाइक और राजपूत सभी मिलकर करते हैं। मेला दो दिन लगाया जाता है। पूर्णिमा की रात में झंडा लगाया जाता है जिसमें शामिल होने के लिए २२ पडहा में जितने भी गांव के पहान रैयत है ं वे सभी नीले रंग के झंडे में अपने -अपने गांव का नाम लिखवा कर लाते हैं।
सभी अतिथि पहानो का सोनमेर के वासी मिल कर स्मरणीय (यादगार) स्वागत करते हैं।मेले में पारंपरिक नाच (दसई नाच)का आयोजन किया जाता है। इस नाच को खोंडहा (समूह) नाच के नाम से भी जाना जाता है। इस नाच में भाग लेने के लिए चेरवादाग ,तुयू , पड़ गांव,कुदलूम। ,कसिरा आदि गांवों के लड़के -लड़किया ं, बच्चे तथा बुड्ढा - बुजुर्ग सभी मिलकर भाग लेते हैं।उनका भेष -भूषा बहुत ही सुंदर और आकर्षक (अलौकिक) होता है। लड़के अपने सिर पर मोर के पंखों से सजी मुकुट ,गले में सुरली और मांदर हांथ में रंग -बिरंगे फीता बांधें,कमर मे इसकाट तथा पैरों में जूता पहने आंखों में चस्मा तो दूसरी ओर लड़कियां रंग -बिरंगी नयी -नयी साड़ियां पहनी हुई अपने बालों को रंग-बिरंगी हरी ,पीली,नीली, लाल रंगों के फीता एवं कागज़ से बनीं फूलों -हारो से सजाती है तथा गले में रंग -बिरंगी कांच की छोटी-छोटी मोतियों से बना हसली नामक हार तथा सुरली पहनती हैं।
जब वे सज-धजकर जतरा टाड नाचते हुए पहुंचतीं हैं तो बहुत सुन्दर दिखती हैं उनका नाच देखकर लोग स्वयं को रोक नहीं पाते और टोला में जाकर नाचने लगते हैं।यह पारंपरिक दसई नाच झंडा के दूसरे दिन भोर ४ बजे शुरू हो जाता है। दिन चढ़ते -चढते सोनमेर मेला पूरी तरह से विभिन्न प्रकार के दुकानों से भर जाता है।
सोनमेर मंदिर में प्रत्येक वर्ष देवी मां को प्रसाद के रूप में एक भैंसा ( काडा) की बलि दी जाती है। बली दी गई भैंसा को सोनमेर गांव के सभी लोग दूसरे दिन प्रसाद के तौर पर ग्रहण करते हैं। लोगों का मानना है कि देवी मैया भैंसा की बलि ले कर आस -पास के सभी गांवों को सुरक्षित रखतीं हैं उनके यहां होने से जंगली हाथियों का भी कोई ख़तरा नहीं है।
मान्यता यह भी है कि बलि दिए गए भैंसा के खून को यदि बिमार व्यक्ति के माथे पर तिलक(टिका) लगाया जाता है तो वह पूर्ण रूप से स्वस्थ हो जाता है। मां को बलि चढ़ने वाले भैंसा की पूंछ से प्रत्येक वर्ष सोनमेर गांव का पहान सुबह ६: बजे से १० बजे तक बिमारो को झाड़ते हैं।काडा की पूंछ से झाडवाने के लिए लोग बहुत दूर -दूर से यहां आते है ंऔर आपनी बिमारी से मुक्ति पाते हैं ।सोनमेर जतरा अब धीरे धीरे एक विशाल मेला का रुप धारण कर लिया है । मेला में खोंडहा ( समूह) नाच के अलावा आर्केस्ट्रा प्रोग्राम का भी आयोजन किया जाने लगा है जिससे मेला बहुत भीड़ होने लगा है। और शाम होते ही धीरे-धीरे खाली होने लगता है और शांति पूर्ण रूप से मेला समाप्त हो जाती है। इस प्रकार सोनमेर मेल ने एक ऐतिहासिक मेला का रुप ले चुका है। सोनमेर मंदिर दार्शनिक स्थल होने के साथ -साथ पिकनिक मनाने का भी बहुत सुन्दर स्थान है कभी वक्त मिले तो एक बार यहां जरूर आएगा
धन्यवाद।
vinay chaubey
12-Oct-2025 07:52 PM
Very nice information, especially about the Dasai jatra mela In September 2025, A few days back, I visited the summer temple it was a truly devotional place . i am also writing about my spiritual journey in my blog queryflag, where I gave your reference about Dasai Jatra Mela and dasai dance, which you truly describe. Thank you for sharing with us hidden and true information.
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