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ADHYATMIK

         बुढ़ा महादेव मण्डा मंदिर खुंटी 

बुढ़ा महादेव मण्डा मंदिर खुंटी से जुड़ी एक सच्ची कहानी बहुत समय पहले की बात है बैशाख महीने में आने वाली अमावस्या के ठीक तीन दिन बाद अक्षय तृतीया के शुभ अवसर पर खुंटी गांव के सभी ग्राम वासी मिल कर अपने गांव में स्थित भूंई फूट शिवजी मंदिर का वार्षिक उत्सव मण्डा महापर्व के रूप में मना रहे थे। गांव में चारों तरफ चहल-पहल होने लगी है। मण्डा देखने के लिए दूर-दूर से अतिथियों का आगमन होने लगा । मण्डा टांड़ तरह -तरह की दुकानों से सजने लगी गांव में जितने भी शिव के भक्त हैं जिन्होंने ने शिवजी के लिए व्रत रखा है वे सभी भोक्ता पूरी गांव में  पाठ देवता को घर -घर भ्रमण करा कर मण्डा टांड़ आ पहुंचे हैं।मण्डा खुंटा पुरी तरह से सज कर तैयार हो गया है और खुंटा की रस्सी खींचने के लिए गांव के छः-सात हट्टे -कट्टे नौजवान तैनात हैं। गांव के पहान और पंडित मिलकर मण्डा टांड़ में फूल नारियल और धूप जलाकर भगवान शिव के समक्ष दोनों हाथों को जोड़कर मण्डा झूलन की रस्म सकुशल संपन्न कराने की प्रार्थना करने लगे । पूजा -अर्चना के पूर्ण होते ही  झूलन की प्रक्रिया शुरू कर दी गई। झूलन का शुभारंभ पाठ भोक्ता ने किया वह शिवजी की जय -जयकारा लगाते हुए मचान में चढ़ गया और खुंटा से बंधी रस्सी में अपनी एक पैर फंसा कर झूलन  झूलते हुए मण्डा टांड़ में उपस्थित लोगों के उपर फूलों को फेंकते हुए मनी -मनी शिवा मनी बहे। कहते हुए झूलन की रस्म सकुशल पुरी कर मचान से नीचे आ गया। उसके नीचे उतरते ही दूसरा भोक्ता मण्डा झूलने लगा उसने अपने हाथों में फूल पकड़ कर मनी -मनी शिवा मनी बहे पुकारते हुए अपनों के उपर फूलों को फेंकते हुए झूलन झूलने लगा  खुंटा एक  चक्र  लगा कर अचानक एक   स्थान पर जाकर ठहर गया।मण्डा टांड़ में  उपस्थित सभी लोगों की सांसें एक क्षण के लिए रुक सी गई लोग डर से चिल्लाते हुए खुंटा की रस्सी को पकड़ कर ज़ोर -ज़ोर से खींचने लगे दोपहर से घना अंधेरा हो गया पर खुंटा का चक्र टस से मस नहीं हुआ।  मण्डा लगाने की सारी खुशी क्षण भर में मातम में बदल गया और पूरे गांव में सन्नाटा पसर गया मण्डा टांड़ में उपस्थित सभी लोगों के आंखों से आंशु बहने लगी ।उनका ह्रदय दुःख के सागर में डूब गया वे  सभी उस उपासक भोक्ता को भगवान शिव के हवाले कर खुंटा में ही छोड़कर अपने -अपने घरों की ओर चल पड़े। भोक्ता की मां  लाचार और विबस हो कर करुणा भरी आवाज में शिवजी से आंचल फैला कर बार -बार अपने बेटे की जिंदगी की भीख मांगने लगी। कहते हैं कि भोक्ता की मां ने अपने बेटे की जिंदगी बचाने के लिए साल भर शिवजी की तपस्या की वह रोज सुबह 4 बजे उठ कर मंदिर के पीछे बनी तालाब में स्नान करती और सूर्य उदय होने से पूर्व एक लोटा जल शिवजी के चरणों में अर्पित करती ।बिना रुके उसने भूखे प्यासे शिवजी की आराधना की। समय गुजरता गया और बैशाख महीना आ पहुंचा पर इस बार गांव में कोई हलचल नहीं है मण्डा टांड़ में भोक्ता का शव अभी भी खुंटा से टंगा हुआ है !और  धूप में सुखकर झुरी हो गया है।मण्डा का नाम सुनते ही खुंटी गांव के लोगों का रुह कांप उठता है। आज अक्षय तृतीया के शुभ बेला में भोक्ता की मां तालाब में स्नान कर के एक लोटा जल शिवजी के चरणों में अर्पित करने के लिए मंदिर प्रांगण में जैसे ही पांव रखीं। उसके ह्रदय में अचानक वत्सल उमड़ पड़ा आंखों से झर- झर नीर बहने लगी चारों तरफ़ एकाएक सरसाराती  हुई हवायें चलने लगी  और मंदिर में टंगी  घंटियां खुद ब खुद टन -टन -टन कर बजने लगी मण्डा खुंटा अपने आप  घना -घन घुमने लगा खुंटा में मृत पड़ा भोक्ता जीवित हो उठा और जोर -जोर से मनी -मनी शिवा मनी बहे पुकारते हुए झूलने लगा उसके द्वारा लगाए गए जय -जयकार से मण्डा टांड़ सहित पूरा खुंटी गांव गुंज उठा । मनी -मनी शिवा मनी बहे की पवित्र गुंज सभी ग्राम वासियों के  कानों में मिश्री घोलने लगा।लोग जिस भी हालत में थे वे वैसे ही हालत में मण्डा टांड़ की ओर दौड़ पड़े । मण्डा टांड़ पहुंच कर लोगों को अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हुआ वे एक दूसरे को चींटी कटवाने लगे ।साल भर से मण्डा खुंटा में मृत अवस्था में टंगे भोक्ता को अचानक अक्षय तृतीया के शुभ मुहूर्त में जीवित देखकर लोगों को बहुत आश्चर्य हुआ भगवान शिव  के प्रति कमजोर पड़ी उनकी भक्ति में शक्ति आ गई थी । लोगों के ह्रदय में एक बार पुनः भगवान शिव के प्रति श्रद्धा जाग उठी। मां को उसका खोया हुआ बेटा मिल गया और खुंटी गांव में मण्डा महापर्व फिर से धूमधाम से लगाया जाने लगा।

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