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बुढ़ापा एक अभिशाप-08-Dec-2025





                 बुढ़ापा एक अभिशाप 


अक्सर ऐसा क्यों होता है ?कि !मां - बाप का बुढ़ापा आते ही ।उनके अपने जने बच्चे नन्हे, राजदुलारे, लाड़ले वसीयत के लालच में आकर सिर्फ और सिर्फ अपने फायदे के लिए ज़िन्दगी के आखिरी पायदानों, सीढ़ियों पर खड़े बेचारे बुढ़े माता  - पिता का बट वारा दो बराबर हिस्सों में बांट कर एक- दूसरे से अलग कर देते  हैं। कभी - कभी तो ऐसी दु:खद घटनाएं भी घटित हो जाती है कि धन - दौलत, वसीयत के लालच में अंधे हो चुके बेटे  बुढ़े माता- पिता को उनके अपने बनाए घरों से धक्का मार कर बाहर निकाल देते हैं। दर - दर की ठोकरें खाने के लिए । लेकिन ख़ास बात तो यह है कि उन बेटों के आंखों पर शर्म ,हया की छोटी सी झलक भी दिखाई नहीं देती।वे बड़े ही शानो-शौकत से अपनी बसाई छोटी सी दुनियां में व्यस्त हो जाते हैं, जहां एक पत्नी और दो बेटा - बेटी के अलावा कोई नहीं है।ज़िन्दगी के इतने  सारे गहरे उतार - चढ़ाव से तंग आकर  हताश - निराश हो चुके। मां  - बाप अपने बच्चों के किए हर एक फ़ैसलों को आंख मूंद के स्वीकार करते हुए चुपचाप विराह वेदना की आग में झुलसते गहरा घाव ह्रदय में ले कर भारी मन से एक - दूजे से जुदा हो जातें हैं।
                 माता और पिता अपने गहरे दु:ख, तकलीफों में भी कभी अपने बच्चों के लिए  बुरा नहीं सोच सकते । उनके ह्रदय से सदा अपने बच्चों के लिए मंगल कामनाएं ही निकलती हैं।और हाथ सदियों से आशीर्वाद देने के लिए ही उठें हैं,और सदा उठते रहेंगे।मां - बाप का ह्रदय एक बहती हुई झरिया (दरिया) है। जिसमें बच्चों के संघीन से संघीन अपराध उनके जुर्म धुल जाती  है।और ममता की गहरी खाइयों में डुबकियां लगा कर  अपराध नादानियों में बदल जाया करती  है।
               बुढ़ापा! जीवन के अंतिम दौर का एक सुनहरा वक्त होता है ।जब पति - पत्नी जवानी में बिताए  । उन ख़ास लम्हों को एक - दूसरे के साथ बिताए खुशियों के   पलों को साथ बैठकर गर्म चाय की चुस्कियां लेते हुए याद करके एक - एक क्षण दोबारा जीवन जीने लग जाते हैं। साठ साल बाद एक बार फिर मुरझाएं दो फूल यादों की ताज़ी थपेड़ों में पुनः पुलकित होने लगती हैं। वीरान पड़ी जीवन में यादों की एक मिट्ठी एहसास कलियों सी चटकने लगीं हैं।लेकिन अफ़सोस उनके जज़्बातों, ख्वाहिशों की   कहीं कोई कद्र नहीं हो  पाती है। स्वार्थ में अंधे हो चुके बच्चे अपने बुजुर्ग माता-पिता के सुन्दर सपनों उनकी हसरतों को अपने पैरों के नीचे बेरहमी से कुचलते हुए मां बाप को एक दूसरे से जुदा कर बैठते हैं। केवल अपने क्षणिक तथा खोखली सुख- चैन , बनावटी हंसी के लिए। ये हकीकत अटल सच्चाई जानते हुए कि यह ग़लत काम है ।कर्मा बहुत  वफादार है, अपने मालिक के पास एक न एक दिन लौट कर अवश्य आएगी और वही घीनोना खेल उनके साथ भी उनके अपने बच्चों द्वारा खेला जाएगा। फिर भी लोग गलतियां करने से पीछे नहीं हट रहे हैं। दिन - प्रतिदिन बांट वारे का यह खेल नए - नए रूप में सामने आ रहे हैं।
                       बांट वारे में ज्यादातर देखने में आया है कि मां छोटे बेटे के हक़ में आ जाती है ।और पिताजी बड़े बेटे के हिस्से में चलें जातें हैं। और यदि संयोग से किसी मां बाप के बेटों की संख्या दो बेटों से बढ़ कर तीन - चार या फिर चार - पांच हो गई तो उन बदनसीब माता-पिता की बांट वारा घोर निंदनीय, घृणा से भरी तथा लज्जा की खानों से परिपूर्ण दर्द दाईं हो जाती है।वे हट्टे - कट्टे नौजवान अपने मां-बाप को दो वक्त की रोटी खिलाने , एक जोड़ी कपड़ा पहनाने और दवा दारू कराने से इस तरह से कतराते हैं ।जैसे वे उन्हें जानते ही नहीं कभी उनसे मिले ही नहीं।बुढ़ापे के शिकार में थक कर चूर - चूर हो गए लाचार मां - बाप को छ: छ: महीने आपस में बांट कर ऊंची डींगे हांकते हैं ,कि हम बुढ़े माता - पिता की सेवा कर रहे हैं। उन्हें अपने साथ रख कर  रौब झाड़ते हैं। मेरी एहसान मानो कि हम तुम्हें इतनी महंगाई में पाल - पोस रहे हैं।
                  एक क्षण लेकिन!पालने पोसने की धमकियां इंसान किसे दे रहा है? उस मां को जिसने नौ महीनों तक अपने कोख  में बिना किराये के रखा और अपने किमती लहू से सींचा हजार दर्द सहे।उस पिता को जिसने तुम्हारे इंतिज़ार में  कई - कई रातें जाग कर बिताई । तुम्हें किसी चीज की कमी न हो ।कोई दु:ख - दर्द, तक़लीफ तुम्हें छु न पाए।इस के लिए दिन-रात कड़ी से कड़ी मेहनत की ।पसीना पानी की तरह बहाया  लोगों की फटकारें सुनीं सिर्फ अपने बच्चों के लिए मां ने अपनी पलकों पर सजाया लेकिन पिताजी ने अपनी कंधे पर सारी जिम्मेदारियां उठाई।
 सदियों से संघर्ष  मां और पिता जी ने मिलकर किया है। पालने - पोसने का( बीड़ा) जोख़िम मां - बाप  दोनों ने मिलकर उठाया है। पालने का रीत ,नेग, नियम और दस्तूर युगों - युगों से यही बुज़ुर्ग मां - बाप ने मिलकर एक साथ निभाया है।बिना किसी स्वार्थ के न कोई शर्त के। एक से इक्कीस बच्चों को पाला। अपने ह्रदय में सहेज   समेट कर रखा सबको एक नज़रों से देखा एक सा लाड़ - प्यार दिया। और बच्चों से दो बुढ़े माता- पिता संभाले नहीं जा रहे।
 दो सुखी बासी रोटी खिला कर पूरे घर का काम सुबह से शाम नौकर - नौकरानियों की तरह ( खटवा) करवा कर । ताना मारते हैं।हम हैं जो तुम्हें घर में रख रहे हैं। कोई और होता तो अब तक घर से लात मार के बाहर निकाल दिया होता।भीख मांगती किसी मंदिर के सीढ़ियों में बैठ कर।
इतने कठोर ह्रदय तोड़ने वाली बातों को सुनकर बुढ़े  माता- पिता   का कलेजा दर्द से फटने लगी है। बुढ़ापा मन को बार-बार कंचोंटने लगी है। आंखों से पानी अब सुख गए। ज़िन्दगी  मृत पड़ी शीला सी भार लगने लगी है। जाने अनजाने बुढ़ापा अभिशाप बन गया।जीवन एक उपहार है। इस उपहार रुपी जीवन का हर क्षण बहुमूल्य है। किस्मत वालों को मिली है यह जन्म इंसानों का ! गंवाना नहीं एक भी क्षण बेकारी में,लगा लो मन  ! मानव सेवा में,पशु - पक्षियों के दाना पानी जुटाने में,लगावो अपने प्राण की बाज़ी देश का गौरव बढ़ाने में, देश की आन - बान और शान  में। अहंकार छोड़ो शीश झुकाओ  मां- बाप के पवित्र चरणों में जहां बसा करती है स्वर्ग सुंदर। मिलती हैं अपार खुशी शांति परम आनन्द। मां बाप भगवान का रुप फूल माला न सही कम-से-कम चेहरे पर एक मधुर मुस्कान के साथ मिलकर सुन्दर - कोमल पैरों को छूकर आशीर्वाद लेलो दूध न सही एक गिलास पानी या गर्म चाय ही पीला कर दो टुक बतिया लो उनका हाल - चाल ही पूछ लो। मां - बाप के चरणों में बैठते ही जिंदगी का आधा से अधिक दुःख खत्म हो जाती है। गलतियां सुधारो बुढ़े माता- पिता का सहारा बनों।

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