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दुःख लागे अपना- अपना सा-10-Dec-2025


  दुःख लागे अपना - अपना सा 

दुःख से मिल कर ऐसा लगा मानों मेरी उसकी सदियों पुरानी पहचान हो, हो कोई रिश्ता ख़ाश दुःख का मेरे साथ   ।

दुःख मेरे पीछे ऐसे पागल जैसे सुंदर फूलों के ऊपर भंवरों का भिन्न - भिन्ना उसकी खुशबू में तितलियों का खोना पंक्षियो  का मचलना ।

 हाय ! दुःख के   चेहरे की नूर क्या ?गंभीर चिंता, शंकाओं में भय की नदियां में डुबी परेशानी में ,बेचैनी में ,अकुलाती है।जब भी मैं मिली दुःख से हुई मैं आश्चर्य !
उसके मुख पर तनिक भी घमंड दिखाई नहीं देता 
दुःख पुरी तन्मयता के साथ दामन बिछाए खड़ी थी ।इंतिज़ार में ।

ज़िन्दगी की इतनी लंबी डगर में अनजानी सफ़र में कदम - कदम पर हर पल हर सांस - सांस में दु:ख ने निभाया साथ छोड़ा न हाथ मेरा।

मैं मिलने गई थी। एक सुबह सुख से ! छुड़ा कर अपना हाथ दुःख से। सुख ने इतरा कर पूछा मेरा हाल होंठ बिदकाएं भंवा चमकाया। मेरी ही नज़रों से उसने दिखाई मुझे मेरी औकात झटक कर ऐसे उठ खड़ी हुई जैसे चुभा हो कांटे कोई हरजाई।

सुख ने मुझे अपने गोल - गोल आंखों से ऐसे घूरा जैसे बकरे को देख क़साई घूरे ।मैं बेचारी दुःख की मारी सुख को तिल भर न भायी न सोहाई । सुख थी, गर्व में फूली अहंकार में हुई थी चूर। उसने ऊपर देखा न ही नीचे अगल देखा न ही उसने बगल सुख ने मुझे खुशियों के महफ़िल से धकेल कर ऐसे बाहर निकाल दिया जैसे पूल में फंसीं कारखाने की कोई गन्दा कचरा हो ।


हताश -निराश मैं निकली थी ! दहलीज़ पर सामने खड़ा था दुःख स्वागत में मेरी बनके सखी।दोनों बाहें खोलें भर लिया मुझे अपनी बाहों में लगा लिया उसने सीने से मुझे।पाके सहारा दुःख का!रोयी मैं खूब सीसक - सीसक के।

हुआ एहसास मुझे खा कर ठोकरें सुख की ।
जिस लापता सुख चैन की खोज में हर दिन हर घड़ी जिसके पीछे मैं भागती फिरती हूं।वो  सुख है ,ही नहीं अपनी! उससे आती है एक बू पराये पन की ।

मुझे तो दुःख की चादर प्यारी लागे।लागे दुःख अपना - अपना सा ।

दुःख के स्पर्श में है एक जादू है एक अजीब सा नशा  !उसके छुने से मैं अपनों के याद में बैठी । अपने खड़े थे सुख की दहलीज पर खुशियों का हार पहन कर।देखा न एक पल अपनों ने झुक कर मुझे। मैं बैठी थी दुःख के साथ ।
हुई कृपा दुःख की मुझ पर!राह दिखाई उसने मुझे सुन्दर 
याद आएं मुझे श्याम सुन्दर मेरे मुरली मनोहर श्री कृष्ण, प्रभु श्री राम जी का कोमल चरण कमल।

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