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" बचपन "

एक छोरा

रंग  गोरा
उम्र - बारह साला
कबाड़ बटोरने वाला
मैल जमी है तन पर इतनी,
दीख रहा है काला
कितना भोला - भाला !
झूल रहा कन्धे पर उसके
एक बड़ा - सा बोरा !
"शिक्षा का अधिकार सभी को"
मत पीटो ढिंढोरा !

कूड़े के ढेर पर
घूंट आंसुओं के पीकर
खिन्न मन
जर्जर तन
ओठ सूखे
पेट   भूखे
निज कर्म कर रहा
नंगे पांव चल रहा
धूप में जल रहा
"श्रम-मंत्रालय क्या कर रहा ?"
टूट कहीं न जाए,
उसके जीवन का डोरा !

गर्म लू के झोंके से लहराते,
उसके रूखे - सूखे बाल
धंस गए हैं गाल
आंखों में फैला है- उदासी का जाल
समग्रता में देखें - तो लगता नर-कंकाल
उलट-पुलट कर कचरे से,
बीन रहा वो रद्दी - माल !
नष्ट कर दिया श्रेष्ठ जनों ने,
उसका बचपन कोरा !
*******************************
वीरेन्द्र प्रताप सिंह
बलिया, उत्तरप्रदेश
मो.नं.8874101493.

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7 Comments

बहुत ही jivant अभिव्यक्ति

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लाजवाब लाजवाब लाजवाब Outstanding

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Virendra Pratap Singh

21-Aug-2022 11:08 PM

शशांक जी को मेरा आत्मीय आभार.

Reply

Dr. Vashisth

08-May-2021 11:17 AM

बहुत अच्छा लिखा सर

Reply

Virendra Pratap Singh

08-May-2021 12:28 PM

Thanks for likening my prestige love, Dr.Vashisth.

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