" बचपन "
एक छोरा
रंग गोरा
उम्र - बारह साला
कबाड़ बटोरने वाला
मैल जमी है तन पर इतनी,
दीख रहा है काला
कितना भोला - भाला !
झूल रहा कन्धे पर उसके
एक बड़ा - सा बोरा !
"शिक्षा का अधिकार सभी को"
मत पीटो ढिंढोरा !
कूड़े के ढेर पर
घूंट आंसुओं के पीकर
खिन्न मन
जर्जर तन
ओठ सूखे
पेट भूखे
निज कर्म कर रहा
नंगे पांव चल रहा
धूप में जल रहा
"श्रम-मंत्रालय क्या कर रहा ?"
टूट कहीं न जाए,
उसके जीवन का डोरा !
गर्म लू के झोंके से लहराते,
उसके रूखे - सूखे बाल
धंस गए हैं गाल
आंखों में फैला है- उदासी का जाल
समग्रता में देखें - तो लगता नर-कंकाल
उलट-पुलट कर कचरे से,
बीन रहा वो रद्दी - माल !
नष्ट कर दिया श्रेष्ठ जनों ने,
उसका बचपन कोरा !
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वीरेन्द्र प्रताप सिंह
बलिया, उत्तरप्रदेश
मो.नं.8874101493.
Shashank मणि Yadava 'सनम'
20-Aug-2022 12:32 PM
बहुत ही jivant अभिव्यक्ति
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Shashank मणि Yadava 'सनम'
20-Aug-2022 12:31 PM
लाजवाब लाजवाब लाजवाब Outstanding
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Virendra Pratap Singh
21-Aug-2022 11:08 PM
शशांक जी को मेरा आत्मीय आभार.
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Dr. Vashisth
08-May-2021 11:17 AM
बहुत अच्छा लिखा सर
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Virendra Pratap Singh
08-May-2021 12:28 PM
Thanks for likening my prestige love, Dr.Vashisth.
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