कविता
बड़े बड़े दुख के बादल हैं
जो घटे नहीं है अब तक
क्या आस लगाई है, हमने
क्या घटेंगे यह बादल तुम्हारे आने तक।
जब से जन्म लिया है, धरती पर
दुखो का तो अम्बर टूट पड़ा है हम पर
दुख से सुख की ओर हम ऐसे चले है,
क्या घटेंगे यह बादल तुम्हारे आने तक।
क्या कभी दुख के बादल घटेंगे अम्बर तक
यही तो जिज्ञासा है, हम सब पृथ्वी वासियों की
बस हम साधारण लोगों की इतनी जिज्ञासा है,
क्या हम भी कभी सुख की सैर करेंगे।
Sonali negi
03-Jun-2021 03:24 PM
Nice
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