परिवार
*परिवार*
आंखें खुली थी मद्धम-मद्धम,
मद्धम उंगली हिलती थी
दो जने घर में दिखते, जो मेरा संसार था।
हां, वो ही परिवार था।
हां, वो ही परिवार था।
कुछ बड़ा हुआ, कुछ होश लिया,
कभी जगता था, कभी सो लिया, दिल पर कोई वार था ।
हां वो ही परिवार था।
हां वो ही परिवार था।
कुछ और बढ़ा, चलना सीखा,
गिरते पड़ते, बढ़ना सीखा
गिरने से मेरे जो अक्सर, गिरता कई - कई बार था।
हां वो ही परिवार था।
हां वो ही परिवार था।
स्कूटर से स्कूल में जाना,
मां की गोद में वापस आना
आकर घर में उधम मचाना, ही खुशियों का सार था।
हां वो ही परिवार था।
हां वो ही परिवार था।
वो कॉलेज के दिनों की मस्ती,
कोई फिकर ना दिल में बसती
पिता के ही कंधों पर तब तो घर का सारा भार था।
हां वो ही परिवार था।
हां वो ही परिवार था।
वो पहली जॉब की खुशी मनाना,
वीकेंड्स में घूमने जाना
जीता हुआ महसूस कराया, लगा न था कभी हार सा।
हां वो ही परिवार था।
हां वो ही परिवार था।