AKHAND MISHRA

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समाज और आधुनिकता

                            "समाज_और_आधुनिकता"


आधुनिकता की इस अंधी दौड़ में लोगों ने अपने आपको कहीं गुम सा कर दिया,,, वास्तविकता को त्याग कर लोग दिखावे की दुनिया को पूरी तरह से स्वीकार कर चुके हैं।

चाहे वह संस्कृति हो आचरण हो या धार्मिक प्रवृत्ति हो सभी में बस दिखावे की ही चहल-पहल ही आज शेष रह गई है इसका मूल कारण है तेजी से हुआ आधुनिकीकरण,,,

 कहते हैं ना कि हर चीज के दो पहलू होते हैं, तो आधुनिकीकरण कुछ पहलुओं पर तो खरा उतरा परंतु दूसरी ओर इसने आधुनिकता का विष भी समाज में घोल दिया,,, 

आज लोगों में भावनाएं सिर्फ सोशल मीडिया तक ही सीमित रह गई हैं,, इनका वास्तविकता से दूर दूर तक कोई लेना देना नहीं है,, आधुनिकता में लोग इस कदर पागल हो गए हैं कि अपनी संस्कृति, रिश्तों, रीति-रिवाजों, आचरणों और मर्यादाओं को भुला चुके हैं,,, 

धार्मिकता, ईश्वर साधना, पर्व-त्यौहार सिर्फ एक मनोरंजन का विषय बन कर रह गए हैं। ( जैसा कि मैंने कई बार देखा है कि धार्मिक स्थलों में लोग ईश्वर की आराधना कम मोबाइल पर सेल्फी ज्यादा निकालते हैं, यह इस बात का सूचक है कि ईश्वर और उसके प्रति आस्था सिर्फ एक मनोरंजन और दिखावे का विषय है।) 

आज सोशल मीडिया का नशा समाज के हर वर्ग कि लोगों के सर चढ़कर बोल रहा है,,

रिश्तो में आजकल प्यार और स्नेह की जगह सोशल मीडिया घुस गया है,, यह सोशल मीडिया का कीड़ा लगभग पूरे समाज को काट चुका है,,,

अच्छा एक बात यह भी है सोशल मीडिया का सकारात्मक उपयोग ना के बराबर ही किया जाता है,,, सिर्फ अंधाधुंध नकारात्मकता..!

आने वाली पीढ़ियां वास्तविकता कि दुनिया से कोसों दूर होगीं न उन्हें अपनी संस्कृति का ज्ञान होगा ना ही आचरण और सभ्यता का क्योंकि आधुनिकता के परिवेश में कई ऐसे तत्व पनप रहे हैं जो इन्हें इन सभी चीजों से दूर-दूर तक सीमित कर देंगे,,, आज वर्तमान में यह स्थिति है, ना जाने आने वाले वर्षों में क्या हालात पैदा होंगे,,,

क्या यह सब बदलेगा? अब शायद ही कुछ बदलाव हो क्योंकि दिन प्रति दिन तो तकनीकी विकास ही होगा अपने राष्ट्र में, उसके साथ-साथ लोगों की भावनाएं भी बदलेंगी,,

अगर आप किसी को समझाना भी चाहे तो आप असफल रहेंगे क्योंकि आजकल इन सभी बातों का महत्व किनारे में पड़े कचरे के समान है,,

फिर भी कई महान व्यक्तित्व के धनी लोग पूरे जोरों शोरों से लगें हैं कि शायद कुछ बदल जाए समाज मेंऔर लोग गर्व से अपनी संस्कृति को स्वीकार कर सकें,, क्योंकि यहां तो लोग हिंदी बोलने में भी शर्म महसूस करते हैं,,,
लोग अपना व्यक्तिगत चिंतन छोड़ राष्ट्र की निंदा करने में रात दिन लगे रहते हैं।

 जब भी मैं एकांत में बैठता हूं तो यह विचार मेरे मन में अचानक ही उत्पन्न होने लगते हैं इसीलिए शायद यह विचार आज मेरे लेखन का हिस्सा बन गए,, 

ये तेजी से बदलता हुआ परिवेश इस बात का सूचक है कि आने वाला समय और भी ज्यादा जद्दोजहद वाला होगा,,, 

मैं खुद भी इसके लपेटे में हूं क्योंकि मैं भी समाज का हिस्सा हूं पर मेरे लिए आज भी मेरी संस्कृति, मेरा राष्ट्र, धार्मिक आस्था, मर्यादा ,और मेरे अपने इस आधुनिकता से कहीं ज्यादा सर्वोपरि हैं।

(लेख में सुव्यवस्थित एवं समुचित शब्दों का प्रयोग मेरे द्वारा किया गया है,, त्रुटि के लिए क्षमा प्रार्थी हूं।)

__अखंड मिश्र 'एके'✍️

(Note- Writing or posting the post anywhere without the real name of the author is punishable under the CopyRight Act 1957. All rights reserved.)

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5 Comments

Seema Priyadarshini sahay

26-Jan-2022 12:59 AM

बहुत खूबसूरत

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AKHAND MISHRA

27-Jan-2022 11:42 PM

आभार सीमा जी 🙏

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Aliya khan

21-Jan-2022 04:10 PM

Bahut sundar

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AKHAND MISHRA

23-Jan-2022 11:10 AM

Sukhriya 💐💐

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kapil sharma

21-Jan-2022 11:28 AM

👍👍👍

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