AKHAND MISHRA

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एक नैराश्य चिंतन

                               ~एक नैराश्य चिंतन~

कभी-कभी आकस्मिक मेरी चेतना शून्य सी हो जाती है और मैं एकाएक स्थिर हो जाता हूं...गहरी सोच में डूब सा जाता हूं मैं.. 

सोचता हूं.. हवा की तरह सरसराती ये जिंदगी... समय-समय पर तरह-तरह की परिस्थितियां..दायित्व निर्वहन..ये रिश्ते-नाते.. 
और सबसे ज्यादा सिर का भारीपन है ये दिखावा करना,, जो ना चाहते हुए भी करना पड़ता है,, झूठी शान और समाज में बने रहने के लिए....

कभी-कभी सोचने लगता हूं क्या परिणाम है इन सब का वास्तव में जो मैं कर रहा हूं...या करता जा रहा हूं उसका कुछ वास्तविक प्रतिफल है भी या नहीं,,

ये लोगों की झूठी बातें और झूठे आश्वासन .. समझ नहीं आते मुझे.. सब की सब कोरी-कच्ची बातें..

अपने स्वार्थ में तल्लीन लोग जब मुझसे बेवजह स्नेह करने का ढोंग करते हैं तो अंतर्मन में बड़ी तीव्र जलन सी महसूस होती है...
सोचने लगता हूं इनकी भी कैसी प्रकृति है.. 
ऐसा करने के लिए इनका अंतर्मन गवाही कैसे दे देता है...
अगर करना ही है तो नि:स्वार्थ और निश्छल मन से स्नेह प्रदर्शित करिए ताकि ईश्वर की नजरों में तो आप मानव बने रहें।

समय कितना तेजी से गुजर रहा है..
सब इस दुनिया में एक निश्चित स्वार्थ के पीछे दौड़ रहे हैं 
रोज सुबह उठने से लेकर के रात में सोने तक का  कालानुक्रम यूं ही प्रतिदिन चलता रहता है,,

कहीं किसी की मृत्यु हो रही है तो कहीं खुशियां मनाई जा रही हैं,, 
कहीं शहादत की खबर है तो कहीं मंत्री- मनसबदारों की घरों के जश्न की सुर्खियां हैं...सब अपनी धुन में मस्त हैं.. सब कुछ देखकर या सुनकर किसी के मन मस्तिष्क में कोई फर्क पड़ता है क्या?? हो सकता है क्षणिक मात्र किसी एकाध के मन-मस्तिष्क में आता भी होगा पर बाकियों का क्या??  वो बस वही खुदरने-खाने में व्यस्त हैं...

गलत का विरोध करने में इनकी छाती फटती है..बस दूसरों की कमियां और दूसरों की तकलीफों का मजा लेना हर किसी की फितरत में शामिल हैं..

दूसरों को ज्ञान देना बहुत आसान है.. वही ज्ञान खुद पर आजमाएंगे तो कलेजा मुंह को आ जाएगा..

आज जन्म से लेकर मौत तक सब कुछ दिखावट का विषय वस्तु बनकर रह गया है...
दुनिया वास्तव में मात्र एक छलावा है...

हर एक इंसान छला जा रहा है... किंतु परिस्थितियों और दायित्वों के बोझ तले दबे होने पर उसे इसका रत्ती भर एहसास नहीं होता.. और इन दोनों की बीच पिसते-पिसते एक दिन मृत्यु के आगोश में समा जाता है...

किसी को भी यह आकलन करने का समय नहीं है कि वो  गलत कर रहें है या सही बस करते जा रहे हैं,,
इंसानियत-ईमानदारी की तो बात ही मत करिए...
यहां तो मानवता तक लोगों में समाप्त हो चुकी है,, 
 
आज इंसानो से अच्छे जानवर है..जो बिना स्वार्थ के.. मात्र आपके स्नेह पा लेने पर आपके हो जाते हैं...
पर उन्हें भी इंसान जीने नहीं देता..खाने को रोटी शायद ही कभी देते हों ये लोग.. पर हां..रोड़ चलते एक-दो लात जरूर जानवरों पर जमा देते हैं... 
जैसे वो सब बेजुबान उनके बाप दादाओं की जागीर है..
उन्हें मारने का दायित्व बखूबी निभाना जानते हैं इस समाज के लोग..

खैर...यह सब सोचने का समय किसे है और जो सोचता है वह आज के हिसाब से मानसिक रोग से पीड़ित की श्रेणी में आ जाता है.. ये आधुनिक और दिखावटी समाज उसे "पागल" की उपाधि से नवाजता हैं..आज के वर्तमान का यथार्थ रूप है ये..

आप भी सोच रहे होंगे मैंने यह सब क्यों लिखा क्योंकि मैं भी अपने आसपास यह सब होता देखकर कभी-कभी बहुत गहराई तक सोचने लगता हूं और मेरी बेचैनी बढ़ती है तो उसे मैं अपने शब्दों में व्यक्त करता हूं।

सोचता रहता हूं की हर व्यक्ति जानता है कि इस काम को करने से नुकसान है पर फिर भी उसी कार्य को वह बेझिझक करता है.. ना फिकर और ना ही अच्छे बुरे का ख्याल.. बेशर्मी से भरपूर..बिना लिहाज...बस लगे हुए हैं..

इन सभी बातों का कल्पवास वहीं पर हो जाता है जब कहते हैं- "अरे कुछ नहीं होता..कलयुग है ज्यादा सीधे बनोगे तो कहीं के नहीं रहोगे.." 
बस वहीं से सारी मर्यादाएं, रीति-रिवाज, संस्कार, मानव धर्म.. इन सब कि तेरहवीं कर मुक्ति पा ली जाती है..

मैं तो वास्तव में बहुत अत्यधिक सोचता हूं.. और मेरी सोच में थोड़ा अलगावपन है...
मैं ढोंगपन और दिखावे के लिए किए गए हजार कार्यों की बजाए..केवल दस कार्य..सच्चे स्नेह और आत्म संतुष्टि से करना पसंद करता हूं।

अगर आप वास्तव में समाज व राष्ट्र हित में कुछ करना भी चाहेंगे तो ही खोखला समाज दस तरह के अड़ंगे लगाएगा और अगर इन सब से बच भी गए तो यह भ्रष्ट और असफल सिस्टम आपको समेटकर किसी गड्ढे में डाल देगा।

यह सब झूठे दावे... युवा शक्ति और राष्ट्र का निर्माण.. 
बड़ी-बड़ी बातें और राष्ट्रहित के नाम पर लोगों को मूर्ख बनाना तब तक चलता रहेगा जब तक ये समाज और उसमें  रहने वाले लोग जमीनी स्तर पर आकर अपनी मानसिकता नहीं बदल लेंगे.. क्योंकि ऐसे लोग ना तो खुद कुछ करेंगे और जो एकाध करने वाले होंगे उनको भी पीछे धकेल देंगे।

क्योंकि आज का युवा वर्ग एक विशेष बीमारी का शिकार है और वह है टेक्नोलॉजी व उसका नकारात्मक उपयोग..
यदा-कदा इससे बचे युवा ऊंचे स्तर के नशे में संलिप्त है..
अब इनसे राष्ट्र के संबंध में या राष्ट्र निर्माण के बारे में बात करना या राष्ट्र निर्माण के संबंध में योगदान की कल्पना करना सरासर बेमानी है..

फिर इस संबंध में खोखली पृष्ठभूमि बनाने का मतलब ही क्या है ? देश का शायद ही ऐसा कोई कोना बचा होगा जो भ्रष्टाचार से मुक्त हो.. और हां मैंने कहा ना कि- जो यदा-कदा बचे भी होंगे उनको यह समाज और सिस्टम बहुत पहले किसी गर्त में धकेल चुका होगा।

अखंड मिश्र 'एके'✍️
(स्वरचित)

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5 Comments

sunanda

01-Feb-2023 03:37 PM

verry nice

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Rajeev kumar jha

07-Jan-2023 07:55 PM

Nice

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Muskan khan

07-Jan-2023 03:22 PM

Nice 👌

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