रंग
आज की प्रतियोगिता हेतु
विधा: कहानी
शीर्षक: "रंग"
घुंघरू का मनका -मनका बिखरा था ।
उसके अंदर काफी शोर था--
वातावरण श्वेत रंगों के बीच काला धुंआ दिख रहा था । किसी का रंग जरूर उड़ा था ।
लगता था अंदर काफी हाथा पाई हुई है।
एक स्त्री का स्वर सुबुकते हुए ,बहुत सी कहानियां कह रहा था ।
महाराष्ट्र का औरंगाबाद --
राधी कमरे से निकलकर बाहर आई ,बिखरे हुये घुंघरूओं एक एक कर उठाने लगी ।
उसने घुंघरूओं को माथे से लगाया ओठों से चूमा गले से लगाया और फफक पड़ी।
हल्के से बुदबुदाई."तुम मेरे पैरों के लिए नहीं बने हो अभी ।"
हल्के हल्के बाल बिखरे थे मुंह पर उड़ आए थे , आसुंओं की बूंदों के बीच चेहरा धुला जा रहा था..।
सोलंकी जा चुका था --
घर को करीने से एक बार फिर व्यवस्थित कर रही थी ,सोलंकी को मीटिंग के सिलसिले में मुम्बई जाना था । वह हिदायत दे चुका था उसे," ऐ सुनो ! आइंदा तुमने घुंघरुओं को हाथ लगाया तो रिश्ता रिश्ता खत्म तुम्हारा मेरा ।"
वह बोला और सच भी था शायद यह ,रिश्ता खत्म हो चुका था मन से भी और दिमाग से भी ..!
परिवार में मां -पिता दकियानुसी ख्यालात वाले ,समाज के ढकोसलों को लाद लिया। बेटी के सुखों से अधिक समाज का भय जिन्हें सता रहा था बोले थे एक बार" अपने घर ही रहो अब ,वही है तुम्हारा ,वहां से अर्थी ही निकलेगी तुम्हारी ।"
एक दिन---
मोबाइल बजता है ,उसने उठाया,।सुनाई दिया एक पुरूष स्वर," हेल्लो !राधी कैसी हो ?"
"तुम क्क्क्कौ.... कौन?"राधी बोली।
---"पहचानो कौन हूं ?"
---"नहीं पहचाना !"
"अरे ! हमें नहीं पता था यों ,भूल जाओगी तुम ।"
"नहीं ऐसी बात नहीं जी कृपया नाम बताऐं आप ?" राधी बोली ।
"ओहह अब नाम पर अटकी हैं ..मैम तो नाम बता दूं...मैं...मैं बृज ..! काव्य से तुम्हारा नम्बर ले लिया था ,क्योंकि मेरा अजंता टूर लगा है,सोचा तुम से भीे मिल लूं। एक आर्टिस्ट और एक डांसर दोनों की अच्छी छनती थी ना ..कभी कॉलेज में.. ! बता दूं मैम मैं होटल में ठहरा हूं होटल "अजंता", रूम नं 2 , औरंगाबाद ।और हां मेरा नं सेव करना ना भूलना । और हां कल आ रही हो तुम ।"
बृज हमेशा जल्दी में रहता था वह जानती थी..।
वह इतना ही बोल पाई," ओके बृज ..आइ विल ट्राई ।( ठीक है बृज कोशिश करूंगी जरूर)
बृज बोला," ये ट्राई क्या है जरूर बोलो राधी..!"
राधी के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान तैर गई ।
वह तैयार हो रही थी ।उसे बृज से मिलने जाना था ।
बृज अजंता और ऐलोरा की गुफाओं में उसे साथ जाने वाला था ।उसने बैग में कुछ सामान और टूटे घुंघरू भी रख लिए ।
वह गाड़ी कर होटल पहुंची ।
बृज ने उसे अचानक देखा आंखें आश्चर्य से फटी रह गई वह बोला," कितनी बदल चुकी हो ,सच ! बीमार हो क्या ?झील सी आंखों की झीलों को क्या हुआ ?स्याह परतें !! ओहह क्या हाल बना लिया ?"
वह चुपचाप शांत थी गहरी नदी की तरह जो बहना जानती है ,कहना नहीं ।
बृज:"याद है मैंने तुम्हारा खूबसूरत पोटरेट बनाया था ?"
"हां क्यों नहीं !!" वह धीरे से बोली।
"अब चलो चलें!"बृज बोला ।
दोनो निकल पड़े ।
वह अपने साथ कैमरा ,केनवास और पेंटिंग और स्कैचिंग का सामान ले गया था ।
अजंता गुफा की ओर ---
खूबसूरती देखते ही बनती थी । घोड़े की नाल की आकृति की तरह गुफा लग रही थी । एक जैसी गुफा के अंदर लगभग तीस गुफाएं थीं ।
सुंदर पेंटिंग बुद्ध , उनके अनुनायियों , खूबसूरत लड़कियों व अप्सराओं की पेंटिंग दीवारों में थी ।
वह कह उठी," बृज देखो हजारों साल से भी यह चमक बरकरार है ..और एक मेरी चमक दो साल में ही खो गई .।"
बृज बोला," सच कहती हो राधी !"
बाहर देखो एक संकरी सी बाघोरा नदी बहती है।
वहाँ देखा बुद्ध भगवान की मूर्तियों से सजी खूबसूरत गुफाऐं --
बृज ने कैनवस निकाला और राधी को एक चट्टान में बैठने को कहा और उसका स्केच तैयार करने लगा ।
सुंदर हरी घाटियों के अंदर अद्भुत गुफाएं घोड़े की नाल सी गुफाऐं...
राधी जोर जोर से घूमना चाहती थी ..आवाज देना चाहती थी नदियों को पर्वतों को, कंदराओं को ...और मन में छिपे प्रेम की कसक को पर , टूटे घुंघरूं याद आते ही सम्भल गई ।
कुछ यों हुआ असर वादियों का राधी बोल उठी," बृज क्या तुम्हारा ब्याह हो चुका ?"
ह्हहं...हम्म्म...!!"बृज हल्के से बोला ।
राधी :,"क्या?"
बृज:"हां हुआ था, अब नहीं..!तालाक हो चुका है। मेरे और उसके विचारों में मतभेद था ।"
राधी:"ओह...!"
आगे प्रश्न नहीं पूछना चाहती थी वह ।
विपरीत विचारों के मेल में विवाह नहीं समझौते देखे थे उसने ।
बृज उसकी खूबसूरत स्केच बना रहा था। वह लगभग तैयार हो चुकी थी ।
वह उसके पीछे आ खड़ी हुई ,बृज पीछे घूमा उसके हाथों से लाल रंग का डिब्बा छूटा और सकेच के केनवास पर गिर पड़ा ।
"ओहह यह क्या हुआ ?!!"बृज बोला ।
राधी बोली," ओ हो महाशय ने खुद ही स्केच बनाया खुद ही रंग चढ़ा दिया ..खूब है खूब है ..देखो कितना खूबसूरत लग रहा !!..कितने दिनों बाद रंग चढ़ा है !"
बृज ने भी उसके हाथों को थाम लिया और कुछ रंग हाथ में लगा था , सूनी मांग में सजा दिया ..एक और खूबसूरत पेंटिंग बन चुकी थी ..गुफा में ..।
राधी के सफेद रंग पर लाल रंग ।
दोनों एक दूसरे की आंखों में डूब चुके थे और खो चुके थे ।
दोनों पर एक दूसरे का प्यार का रंग चढ़ चुका था ।
बृज ने उसके घुंघरूओं को हौले से उसके पांव में बांध दिया ,अजंता की अप्सरा की तरह ।
#लेखनी
#लेखनी कहानी
#लेखनी कहानी का सफर
सुनंदा
Shrishti pandey
27-Jan-2022 08:22 AM
Very nice
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Punam verma
26-Jan-2022 11:53 PM
Nice
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