बोलो न सखी....
# लेखनी दैनिक काव्य प्रति
बोलो न सखी, कौन है वो,
जिसने तेरा चैन लिया,
मैंने देखा रात में तुम,
कर रही थी सपनों में बतियाँ,
बोलो न सखी, कौन है वो....
आज सुबह जब तुम जागी,
अलसाकर ली अंगड़ाई थी,
हाथों से छुपाकर चेहरे को,
जाने क्या सोच मुस्काई थी,
तुम चाहे कुछ न बतलाओ,
सब कह देंगी चंचल अखियाँ,
बोलो न सखी, कौन है वो....
और बाद में जब गई पनघट पर,
जल लिये बिना चली आई थी,
सब सखियाँ बातें करती रही,
पर तुम कुछ खोई खोई थी,
कोई आया है, हमको है पता,
जिसने रंग दी मन की गलियाँ,
बोलो न सखी कौन है वो....
दर्पण के सामने भी तो तुम,
खुद को देख रही थी शरमाकर,
किसी और की नज़रों से जैसे,
तक रही थी सूरत सज धज कर,
इतनी कैसे तुम निखर रही,
तुम्हे देख लजा जाएं परियां,
बोलो न सखी, कौन है वो....
उस पूरे चाँद को देख के क्यूं,
झलकी बेचैनी चेहरे पर,
कभी है उदास,कभी मुस्काती,
होता तुझको क्या रह रहकर,
वो भी तरसता होगा रे,
जिसने छीनी तेरी निंदिया,
बोलो न सखी, कौन है वो....
अब बहुत हुआ,मुझे सबर नही,
खोलो इस राज़ की परतें तुम,
मन की वीणा के तारों पर,
किसने छेड़ी है प्रेम की धुन,
व्याकुल सी खिड़की पे बैठी तुम,
किसे ढूंढती रहती यहाँ वहाँ,
बोलो न सखी, कौन है वो....
– प्रीति ताम्रकार
Kaushalya Rani
03-Feb-2022 04:04 PM
Nice
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N.ksahu0007@writer
02-Feb-2022 09:54 PM
Nice
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Seema Priyadarshini sahay
02-Feb-2022 09:23 PM
बहुत खूबसूरत
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