AKHAND MISHRA

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एक पल की खुशी

एक पल की खुशी____

रोज की तरह आज भी प्रतिभा किचन में डटी हुई थी।
दो बच्चे, वृद्ध सास-ससुर, पति और अंत में खुद को संभालना..! यह सब जिम्मेदारियां वह बारह वर्षों से बखूबी निभा रही थी।

सुबह पांच बजे जल्दी उठना' नहा धोकर पूजा पाठ से निपट कर सीधे किचन में घुसना.. और फिर शुरू होता था प्रतिभा के दिन का सफरनामा..!
"एक गृहस्थ जीवन भी किसी सरकारी सचिवालय से कम थोड़ी है..."

कुछ दिनों से उल्लास रोज ऑफिस जाते वक्त प्रतिभा की सारी भागदौड़ को निहारता रहता और अपना खाने का डब्बा उठाकर ऑफिस निकल जाता।

रास्ते भर सोचता रहता- 'एक स्त्री का जीवन कितना सधा हुआ और व्यस्ततम है' 

एक पल भी फुर्सत नहीं- बच्चों की जिम्मेदारी,  माता-पिता का पूरा ख्याल, मेरी हर छोटी-छोटी चीजों का ख्याल रखना..." पता नहीं खुद को भी समय दे पाती होगी..? ख्याल रखती होगी खुद का..?  इतना सब कुछ करने के बाद क्या समय बचता होगा उसको खुद के लिए?  इसी उधेड़बुन में कब उसकी बस ऑफिस पहुंच गई पता ही नहीं चला।
 
शाम को लौटने पर रोज की तरह उसने प्रतिभा को व्यस्त ही पाया.. 

दूसरे दिन सुबह प्रतिभा की आंख खुली तो देखा कि सुबह के 6:00 बज रहे थे हड़बड़ाहट में उठी और सोचा कि "आज अलार्म को क्या हुआ..."

तभी किचन से बर्तनों की टकराने की आवाज सुनकर वह किचन की तरफ दौड़ी तो देखा कि उल्लास बहुत ही सुव्यवस्थित तरीके से चाय नाश्ता तैयार करके खाने के डिब्बे पैक कर रहा था।

प्रतिभा ने गतिशीलता दिखाते हुए उल्लास से कहा- "लाइए मैं कर देती हूं.." ना जाने नींद कैसे नहीं खुली.. यह कहते हुए वह उल्लाश की तरफ बढ़ी...

उल्लास ने बड़े प्यार से उसके हाथों को स्पर्श करते हुए कहा- "आज नहीं.."!  तुम तो ना जाने कितने सालों से प्रतिदिन इसी तरह पूरे समर्पण के साथ हम सब का ख्याल रखती हो 'क्या मैं एक दिन लिए तुम्हारा ख्याल नहीं रख सकता...'!

उल्लास की बातों को सुनकर प्रतिभा के मन में सारे विषाद और थकान को मिटा देने वाली एक सुकून और खुशी की अमिट सी लहर दौड़ गई.. 

उसने लरझते हुई नम आंखों से उल्लाश को अपनी बाहों में भींच लिया.. "आज उन दोनों की आंख में आंसू थे.."

बाहर माता- पिता और बच्चे टेबल पर दोनों का इंतजार कर रहे थे.. 

प्रतिभा के बाहर आते हैं माता पिता ने उसे बड़े प्यार से दुलारा, और आज सबसे पहले चाय की पहली प्याली उसे मिली जो इसकी हकदार थी.. 

प्रतिभा के लिए आज ये "एक पल की खुशी" न जाने कितने वर्षों की थकान और विषाद को क्षणभर में मिटा चुकी थी।

अखंड मिश्र 'एके' ✍️
(स्वरचित एवं मौलिक)
 
(Note- Writing or posting the post anywhere without the real name of the author is punishable under the CopyRight Act 1957. All rights reserved.)

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16 Comments

kashish

05-Mar-2023 02:59 PM

nice

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Chetna swrnkar

19-Jul-2022 09:41 PM

Nice 👍

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सुंदर प्रस्तुति

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AKHAND MISHRA

14-Apr-2022 06:01 PM

बहुत धन्यवाद आपको

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