Sahil writer

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गुमनाम













गुम नाम राहो पर चले जा रहे थे l
ये कौन सी राहो से हम गुजरते जा रहे थे l

न जाने खुद को तन्हा क्यों किये जा रहे थे l
हमतो उसकी याद में बस आँसू बहाए जा रहे थेl

लगता है डर अब तो अपनी ही परछाई से 
हम  तो खुद पर ही सितम ढाए जा रहे थे l

मान मोहब्बत में होती है रुसवाईयाँ बहुत 
हम तो अपने ही दामन को आग लगाई जा रहे थे l

ख्वाबो को भी टूटी हुई कस्ती में करके सवार 
उनको दरिया में बहाने जा रहे थे l

मोहब्बत नाकाम होती है यादो के सहारे चलती है l
ज़िन्दगी की साँसे भी बस उसका नाम लेके ही गुजरती है l

                                   ~sahil writer ~

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