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दुर्लभ चीज

पलंग पर बैठा "रमन" अपनी इतिहास की किताब खोल शिक्षक द्वारा दिए गए पाठ को याद करने की कोशिश कर रहा था.. लेकिन उसका मन किताब में तो लग ही नही रहा था।


उसका ध्यान तो बार -बार कमरे में पड़े लैंडलाइन पर जा रहा था, कि फोन की घंटी अब बजी के अब बजी...।

"रमन" आठवीं कक्षा का छात्र है और वो आज विज्ञान की मासिक परीक्षा में वो अनुतीर्ण हो गया और उसकी शिक्षिका ने कहा था कि वो आज रमन के घर फोन कर के उसके पापा से उसकी शिकायत करेगी। जब भी फोन पर कोई घंटी बजती तो इधर रमन के दिल की धड़कन तेज हो जाती। - (पापा को पता चला तो वो कितना मारेंगे?).. बस ये सोच सोच के ही वो अंदर से कांप रहा था।

उसकी ऐसी हालत देख उसके पापा से रहा नही गया और उसके पास आ पूछने लगे -
“हां रमन, क्या हुआ? क्या कर रहे हो?”

“नही पापा, कुछ नही... बस पढ़ रहा था।” - पिता को अचानक सामने देख वो सकपका कर बोला।

“लेकिन लगता तो नही,, कि तुम पढ़ रहे हो।” - अपनी आंखों से उसको घूरते हुए उसके पिता बोले।

रमन घबरा कर बोलने लगा - “नही पापा, मैं सच कह रहा.. मैं पढ़ाई ही कर रहा हू।”

पापा - “तो तुम्हारा ध्यान बराबर फोन पर क्यों है? कहीं लता मैडम के फोन का इंतजार तो नही कर रहे??”

रमन के तो अचानक होश उड़ गए ---- 
“पापा को इस बारे में कैसे पता चला।” (वो सोचने लगा) 

“क्या हुआ...? यही सोच रहे हो कि बूढ़े बाप को ये कैसे पता चला? दरअसल लता मैडम का आज सुबह ही मुझे फोन आ गया था, उन्होने मुझे बताया कि तुम फेल हो गए हो।
(रमन के पापा ने सीधी बात बोल दी) 

रमन डरते हुए कहने लगा - “पापा वो सांइस मुझे बिल्कुल समझ नही आती, इसलिए मैं उसमें फेल हो गया। आप डांटोगे तो नही?? 

पापा - “सच कहूं.. पहले तो मुझे बहुत गुस्सा आया था, लेकिन जब देखा कि तुम्हारे दिल में डर और पछतावा है.. तब मेरा सारा गुस्सा रफू चक्कर हो गया..।
अच्छा बेटा, अब ये बात ध्यान से सुनो.. 

‘परीक्षा में पास होना या ना होना.. वो अलग बात है।’
‘लेकिन तुम कोशिश भी ना करो, ये तो गलत बात है।’

खैर ये तो मासिक परीक्षा थी। तुम्हारे पास आगे बहुत से मौके आएंगे और उन सब में तुम पास भी हो जाओगे।
परंतु इसके बाद जो जिंदगी की परीक्षा आएगी, वो इससे भी ज्यादा कठिन होगी और तुम्हें उसमें ज्यादा अवसर भी नही मिलेंगे। एक बार फेल तो जिंदगी भर का रोना होगा। 
तो उसके लिए कोई भी परीक्षा हो.. अपनी जान लगा दो तुम, जितना समझना पड़े, जिससे समझना पड़े.. उससे समझो।
बस कभी हार ना मानो... ये मत सोचना कि ये तुम्हारे बस से बाहर है.. तुम नही कर पाओगे।
बस मन में एक दृढ़ संकल्प रखना कि तुम्हें ये करना है...। समझे कुछ???”

रमन - “हां, पापा.. समझ गया। और मैं वादा करता हूं की जी जान से पढ़ाई करूंगा।”

पापा - “तो ये वादा पक्का है?”

रमन - “जी पापा! एक दम पक्का वादा, ईंट के जैसा।”

दोनों पिता पुत्र की जोड़ी खिलखिलाने लगी।

अब रमन के दिल से सारा डर गायब हो गया। आज उसे एक “दुर्लभ चीज” मिल गई थी....। 
हां... दुर्लभ चीज.... उसकी जिंदगी का सार

आज उसके पापा ने उसे ऐसा पाठ पढ़ाया जो उसकी जिंदगी का सार बन गया। बचपन की ये छोटी सी बात... एक पक्की याद बन उसकी सांसों में समा गई और उसे पता चल गया कि,
मन के जीते जीत है और मन के हारे हार।
और अब वो कभी नही हारेगा......

समाप्त 
(वरदान जिंदल “सुगत”) 


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4 Comments

बहुत खूब

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Seema Priyadarshini sahay

22-Mar-2022 01:10 AM

बहुत खूब

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Karan

20-Mar-2022 02:05 AM

Wah

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