प्रनवउँ पवन कुमार
रामचरितमानस मानस का एक दोहा है
प्रनवउँ पवन कुमार,खल वन पावक ज्ञान घन ।
जासु हृदय आगार , बसहिं राम सर चाँप धरि ।।
तुलसीदास जी कहते हैं कि उस पवन पुत्र,श्री हनुमान जी का चरणवन्दन करता हूँ ,प्रणाम करता हूँ जो दुष्टसमूह रूपी दावानल पर ज्ञान रूपी बादल के रूप में छाये हुए हैं ; और जिनके हृदय मे भगवान श्री राम धनुषवाण धारण करते हुए निवास करते हैं ।
सुन्दरकाण्ड के आरम्भ में गोस्वामी जी प्रभू श्री हनुमान की वन्दना करते हुए लिखते हैं...
मनोजवम् मारुततुल्यवेगम् , जितेन्द्रिय वुद्धिमताम् वरिष्ठम्
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्री रामदूतम् शरणम् प्रपद्ये ।।
अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं ,दनुजवन कृषानम् ज्ञानिनाम्अग्रगण्यम् सकलगुण निधानम् वानराणामधीशं
रघुपति प्रियभक्तवातजातम् नमामि ।।
अर्थात...
हे मनोहारी स्वरूपवाले ,वायु के समान वेगवाले अर्थात वायु के समान वेग से आवागमन करनेंवाले,इन्द्रियों को वश में रखनेंवाले , वुद्धिमानों में सर्वश्रेष्ठ,पवनपुत्र ,वानरों के सेनापति,श्री रामचन्द्रजी के दूत मैं तुम्हारी शरण में आता हूँ । अतुलित वल को धारण करनेंवाले,सोनें के पर्वत के समान प्रकाशवान शरीरवाले,दुष्टों के वन रूपी समूह का संहार करनेंवाले,ज्ञानियों में अग्रगण्य,सभी गुणों के को धारण करनें वाले,वानरराज,वायुपुत्र,रघुपति के अतिप्रियभक्त आपको प्रणाम करता हूँ ।
उपरोक्त वन्दना में श्रीहनुमानजी के स्वरूप और गुणों का विस्तार से वर्णन किया गया है । परन्तु मानसकार नें हनुमानजी को कहीं भी क्रोध धारण करनें वाला नहीं बताया है । हाँ लंका दहन के समय प्रभु नें विकट रूप धारण अवश्य किया था परन्तु हमारे जनमानस में,हमारी परम्परा में कहीं भी उनकी उस रूप में पूजा नहीं की जाती । भगवान में विनयशीलता इतनी कि माता सीता के सामनें सूक्ष्म रूप में उपस्थित हुए । जब माता नें कहा कि पुत्र तुम्हारी सेना में तो सभी तुम्हारे जैसे ही होंगे और राक्षस तो बड़े-बड़े और परम् वलवान हैं । तब भगवान नें माता जी को आश्वस्त करनें हेतु अपना वृहद रूप धारण किया । बल इतना कि बालपन में सूर्य भगवान को निगल लिया और सज्जनता ऐसी कि अपना बल ही भूले रहते हैं कि जामवंत जी को कहना पड़ता है कि का चुप साधि रहा बलवाना ।
इधर कुछ वर्षों से एक नयी परम्परा बनी है कि तस्वीरों में,झण्डों पर हनुमानजी के रौद्र रूप को रेखांकित किया जा रहा है ,मेरे विचार से यह परम्परा उचित नहीं है । वेशक वे रूद्रावतार हैं , परन्तु उन्हें उस तरह के रूप को धारण करनें की आवश्यकता ही नहीं है । जिस दिन उन्होनें रौद्र रूप धारण कर लिया दुष्ट तो क्या व्रह्माण्ड ही नहीं रह जाएगा ।
हनुमानजी के कई रूप ऐसे हैं जिन्हे आज की भाषा में पोस्टर इमेज की संज्ञा दी जा सकती है । एक रूप है जगदीश,त्रिलोकीनाथ भगवान श्री राम और धरणीधर श्री लक्ष्मण को दोनों कंधे पर बैठाये हुए । एक स्वरूप है समुद्र पार करते समय का । एक स्वरूप है विशाल शरीर के साथ कंधे पर गदा रखे हुए । एक स्वरूप है पर्वत उठाये उड़ते हुए । एक स्वरूप है भगवान के ध्यान में मग्न । एक स्वरूप है सीना चीरते हृदय में अंकित युगल सरकार की छवि,एक छवि है राम दरबार का जिसमें वे भगवान श्री राम के चरण में बैठे हुए हैं । सभी छवि आकर्षक और कल्याणकारी । अरे हमें दुष्टों को हनुमानजी के रौद्र रूप से डरानें की आवश्यकता नहीं,दुष्टों के लिए तो उनका बस एक बार जय श्री राम कहना ही पर्याप्त है । वो हनुमानजी ही थे जो रावण को उसी की सभा में ललकारकर कहते हैं कि प्रभू श्री राम की शरण में चला जा दुष्ट तेरा कल्याण हो जाएगा । और जब रावण उनके स्वाभिमान पर चोट करते हुए पूँछ में आग लगानें की बात करता है तो उलटि-पलटि कपि लंका जारी । वो तो उन्होनें प्रभु श्री राम और माता सीता की आज्ञा नहीं ली थी नहीं तो वहीं पूरे वंश सहित रावण का काम तमाम कर देते ।
एक बार प्रेम से बोलो
#जय_श्री_राम
#जय_बजरंगबली
© अनुरोध कुमार श्रीवास्तव
बस्ती,उत्तर प्रदेश
Seema Priyadarshini sahay
20-Apr-2022 03:30 PM
बहुत बेहतरीन
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Seyad faizul murad
19-Apr-2022 03:32 PM
Very good
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Anam ansari
19-Apr-2022 11:06 AM
Very nice
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अनुरोध कुमार श्रीवास्तव
19-Apr-2022 02:19 PM
धन्यवाद आपका
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