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शब्दों का जाल

शब्दों के खेल खेलता हूँ,
और इनके प्रयोग से डरता हूँ।

क्या पता कब किसके?
नजरों से गिरवा दे!
क्या पता कब किससे?
लड़ाई छिड़वा दे!

गलत शब्दों से भरी सच्चाई,
लोगों को रास न आती है;
और सही शब्दों से भरी फरेबी,
अक्सर लोगों को भा जाती है।

शब्दों की अपनी एक दुनिया,
अपना मायाजाल है।
जो इसको समझा वो कवि,
नहीं तो वह कंगाल है।

शब्द हैं रचनाकार की जरूरत,
जैसे जीवित प्राणी को हवा।
लेकिन इनके प्रयोग में अंतर,
माँ से बनी गाली, माँ की हुई दुआ।

इसीलिए मैं अपने शब्दों का
प्रयोग सोच कर करता हूँ।
शब्दों से खेलता हूँ तभी 
इनके दुरपयोग से डरता हूँ।

©बिखरी स्याही®

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6 Comments

Shaba

06-Aug-2021 10:21 PM

क्या बात है डाॅक्टर साहब। डर डर कह कर कितनी खूबसूरती से शब्दों से खेल गए आप। आप भले ही कम लिखते हैं, पर जो लिखते हैं गजब लिखते हैं। शानदार।

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वरुण एकलव्य

07-Aug-2021 10:01 AM

धन्यवाद आपा। इतनी प्यारी उत्साहवर्धक समीक्षा के लिए।

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Devendra kumar Gamthiyal

06-Aug-2021 09:41 PM

Sundar likha hai 👌

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वरुण एकलव्य

07-Aug-2021 10:01 AM

धन्यवाद भाई जी🙏🙏😊

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Nitish bhardwaj

07-Jul-2021 05:45 PM

वाह कमाल करते हो गुरु

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वरुण एकलव्य

07-Aug-2021 10:01 AM

धन्यवाद महोदय

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