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कवि

हे कविवर ! तेरी मर्मव्यथा
है कौन यहां पर समझा है ?
तू रोया जब जब भी यहां
ये जग तो यूंही हंसता है

तू लिखता यूंही रोज वहीं
जो घटना कहीं घटता है
पर जनसमूह इसे ' कथा ' कहे
चटकारे लेकर पढ़ता है

जो मर्मभेदी घटना तेरे
अंतर्मन को धिकारे है
ये लोग उसी घटना को
' परिहास ' में उड़ाते हैं

तू कवि है ,तेरी ये आंखें
दूर भीड़ में भी वो देख लेती हैं
जो कभी कभी लोगों को तो
खुद पास में ही ना दिखता है

तू लिखता जब भी ' निज कथा '
तू पात्र ऐसे बदलता है
जैसे तू ' सृष्टिकर्ता '
निज मन की सृष्टि रचता है

एक सुखद अंत देता उसको
जो कभी सुखद ना हो सका
तू रोया जहां असल में था
कुछ ' कल्पना ' कर तू हंसता है

लोग कहे ये कवि ' पागल ' हैं
जो बहका बहका लिखता है
पर वो क्या जाने ये ' पागल '
एक जन्म में ' असंख्य ' जन्म जीता है

ये मूढ़ लोग तो चल जाते
जो तुझको ' पागल ' कहते थे
पर वे क्या जाने ये ' पागल '
तो आज भी ' जिंदा ' रहता है

- रितेश कुमार जायसवाल


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2 Comments

बहुत-बहुत सुन्दर रचना

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Ritesh Kumar Jaiswal

25-Jul-2021 10:41 PM

धन्यवाद सर

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