आतंक




प्रतियोगिता हेतु रचना
दिन -रविवार
दिनांक-७/८/२२
विषय-आतंक

  आतंक के साये में कैसे जी 
रहे हैं लोग,
डर डर के ज़िन्दगी का जहर पी 
रहे हैं लोग,
वेदनाओं की यहां, कोई सीमा नहीं,
यातनाओं की सुई से,जख्म अपने
सी रहें हैं लोग,
कब यहां पर क्या हो जाये ,इसका 
कोई ज्ञान न,
कौन किसका ले निशाना,इसका कोई भान न,
धर्म और मजहब की खातिर लड़ ही रहे हैं लोग,
रख करके गर्दन पे खंजर ,जान की कोई न कीमत,
सरे आम कर कत्लेआम,बचा रहे अपनी अस्मत,
कोई न अफसोस इनको,कह रहे हैं लोग,
ईश्वर ने मानव रूप देकर ,भेजा इस धरा पे था,
धर रहें हैं,वेश दानव का,पाप का घड़ा भरा,
रोकना होगा हमें मिल कर ,इस अत्याचार को,
जो सिर्फ अहंकार वश ,कर भी रहे हैं लोग,


सन्तोषी दीक्षित कानपुर

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5 Comments

shweta soni

08-Aug-2022 01:38 PM

Nice 👍

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👌🏼 👌🏼 👌🏼 लाजवाब

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Milind salve

08-Aug-2022 12:05 AM

V nice 👌

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