Rajeev kumar

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लेखनी कहानी -19-Sep-2022

सवेरा


अमवा के मूंडेर पर बैठी कोयल पौ फटने से पहले ही कुकने लगी थी। आँगन में मुरगे की जोड़ी ने कुक्कड़ू कू  की आवाज से शोर मचाना शुरू कर दिया था। हल्की उमस थी और गुनगुनी सी धुप भी कृष्णा की नींद में खलल डालने में सफल नहीं हो पायी थी।

’’ अरे किशनवा, खाली सुतले रहेगा का ? ’’ कृष्णा की माँ ने आधा आँगन में झाड़ू से धुल कचड़ा समेटकर, कष्णा की चारपाई के पास आकर कहा।
’’ अरे सोने दो न मा। ’’ कृष्णा ने अपनी आँखें बिना खोले, अंगड़ाई लेकर कहा।
’’ न काम का न काज का, सोने दें। ’’
’’ हाँ तो काम काज नहीं है तो का काम करें, गली गली घुमें ? ’’
’’ त का, सुतले रहने से काम मिल जाएगा ? ’’
कृष्णा उठा और गली की खाक छानी, खेत-खलिहान का दौरा किया, दोस्तों के साथ डींगें हांकी, गप्पे लड़ाई और रात को खा-पीकर विस्तर पे पसर गया।
बॉस के द्वारा हिलाने डूलाने से कृष्णा बीते दिनों की यादों से बाहर आया।
’’ क्या सोच रहे हो कृष्णा ? ’’
’’ सर युं हीं बस,पहले की बात। ’’
आज आयकर अधिकाी कृष्णा जाटव , जब तुलना करता है, आज के व्यस्त और कामकाजी जीवन की और बीते दिनों की भटकती बेरोजगार जिन्दगी की तो उन दिनों को याद करके पछताता है। उसके जीवन की रात गहन काली और अंधेरी रही थी, मगर आज उसके जीवन में जागृति का सवेरा आ चूका है।

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7 Comments

Pallavi

22-Sep-2022 09:31 PM

Beautiful

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Abeer

22-Sep-2022 10:57 AM

Acha likha h

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Barsha🖤👑

21-Sep-2022 05:21 PM

Nice 👍

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