Rajeev kumar

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लेखनी कहानी -22-Sep-2022

नसीब लिखने बैठे थे खुदा 
खत्म हो गई स्याही मुझ तक आकर 
रुक्सत किये थे उन्होंने खुशिओं के बड़े काफिले 
रुक गई खुशिओं के आवाजाही मुझ तक आकर 
बाँटने निकले थे मसीहा आबे हयात 
खत्म हो गई दवाई मुझ तक आकर 
जी में आया कि रिहा कर दूँ खुद को हर ग़म से 
क़ैद बन गई वो रिहाई मुझ तक आकर .

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5 Comments

Raziya bano

23-Sep-2022 07:40 PM

Nice

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Swati chourasia

23-Sep-2022 03:27 PM

बहुत खूब

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Muskan khan

23-Sep-2022 03:27 PM

Very nice

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