सच सच कहना अब भी मुझे चाहती हो क्या।
राह पर चलते चलते किसी को देखने की चाह में
अब भी अचानक पीछे पलट जाती हो क्या
सच सच कहना अब भी मुझे चाहती हो क्या।
मिल जाती है निगाहें जब किसी शक़्स से तो
अब भी नजरें चुराकर शर्माती हो क्या
सच सच कहना अब भी मुझे चाहती हो क्या।
कुछ गुलाब कुछ मोरपंख सूखे मुर्झाए हुए
अपनी किताबों में अब भी छुपाती हो क्या
सच सच कहना अब भी मुझे चाहती हो क्या।
हर सुबह हर शाम ठीक वक्त पर
अब भी उस छज्जे पर आ जाती हो क्या
सच सच कहना अब भी मुझे चाहती हो क्या।
अपनी उस खास सहेली से मेरी हर बात
अब भी दिल खोलकर बताती हो क्या
सच सच कहना अब भी मुझे चाहती हो क्या।
जैसे मुझे पसंद थे वैसे ही अंदाज़ में
वैसे ही अपने बाल अब भी बनाती हो क्या
सच सच कहना अब भी मुझे चाहती हो क्या।
बात बात पे रुठ कर नाराजगी दिखाना
अब भी वैसे ही किसी को सताती हो क्या
सच सच कहना अब भी मुझे चाहती हो क्या।
फेंकना वो जलती सिगरेट होंठो से निकाल कर
ऐसा हक़ किसी पर अब भी जताती हो क्या
सच सच कहना अब भी मुझे चाहती हो क्या।
पढ़ना मेरे खतों को दिन में कई कई बार
अब भी उधार के शेरों पर मुस्कराती हो क्या
सच सच कहना अब भी मुझे चाहती हो क्या।
बचाकर पैसे लाना मेरे लिए वो घड़ियां
अब भी किसी को वैसे तोहफे दे पाती हो क्या
सच सच कहना अब भी मुझे चाहती हो क्या।
रूठ जाऊं जो गर कभी तो मेरे ही गम में
तो छोड़ के खाना पीना खुद को जलाती हो क्या
सच सच कहना अब भी मुझे चाहती हो क्या।
सुनने को मेरी आवाज कई कई बार दिन में
अब भी मेरा नम्बर घुमाती हो क्या
सच सच कहना अब भी मुझे चाहती हो क्या।
علما
17-Feb-2021 07:58 PM
Bohut he behtreen , kavita apne likhe hai sir , .. 👍
Reply