Gopal Gupta

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कमर पे चोटी लटक रही है

प्रतियोयिता

विषय--स्वैच्छिक
    ग़ज़ल
नज़र तुम्ही पर अटक रही है,
ये बात सब को खटक रही है,,

उधर दिखा है चमन में भंवरा,
कली जहाँ पर चटक रही है,,

जो मुझ को देखा तो मुस्कुरा कर ,
वो ज़ुल्फ़ अपनी झटक रही है,,

जो बात उस की नहीं है मानी,
वो पाँव अपने पटक रही है,,

वो रूठ कर है पता नहीं अब,
कहाँ पे जाने भटक रही है,,

कोई ख़बर दो गोपाल उस की,
कि साँस लगता अटक रही है,,
      
 Gopal Gupta Gopal 

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5 Comments

Khan

28-Nov-2022 09:43 PM

Bahut sundar 👌🌸

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Gunjan Kamal

28-Nov-2022 07:14 PM

बहुत ही सुन्दर

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Gopal Gupta

28-Nov-2022 01:24 PM

Thanks

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