Gopal Gupta

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परशुराम

कुंठित मन के राग द्वेष से,
ऊपर तो उठना होगा,
शास्त्र शस्त्र जब संग चलेंगे,
तभी धर्म समबल होगा,
अगर चाहिए विजय श्री तो,
कर्म यही उत्तम होगा,
हे कलयुग के मनुज तुम्हे अब,
परशुराम बनना होगा

हो मर्यादित सागर जैसा ,
विस्तार खुले अम्बर जैसा,
बन तेज पुंज तू दिनकर सा,
हो सहनशील धरती जैसा,
धर पलय रूप अग्नि जल सा
मानवता का ऊथान करो,
यह कलयुग है इस युग मे तो,
नहीं राम धरा पर आएंगे,
न ही अर्जुन गाण्डीव लिए,
केशव  करूक्षेत्र मे आएंगे,
मातृ भूमि की रक्षा को,
तुम्हे स्वयं योग्य बनना होगा,
हे कलयुग के मनुज तुम्हे अब,
परशुराम बनना होगा ।

गोपाल गुप्ता" गोपाल "


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2 Comments

Mahendra Bhatt

12-Dec-2022 09:51 AM

बहुत ही सुन्दर

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Gunjan Kamal

11-Dec-2022 02:24 PM

शानदार

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